
घरौंदा टूटता है...
बचती हैं यादें...
सरकती हैं हर दीवार पर...
कसकती हैं घर के हर कोने पर...
बैठक के सोफे पर...
टी.वी. की स्क्रीन पर...
किचन में गैस पर...
मसालों के डिब्बों की गंध में....
कपड़ों से सूनी हो चुकी अलमारी में....
खाली लटकते हुए हैंगर पर...
तरतीब से बेसलवट बिस्तर में...
गलियारे में पौधों के पास...
सूखती हुई डालियों में...
धूप खाते आम के अचार में...
हर कोने से बहती हुई आती हैं...
आँखों में
और फिर
प्रवाहित होती हैं नस-नस में...
गिरते हुए हीमोग्लोबीन के साथ...
तिरती रहती हैं
रक्त की हर बूँद में....
प्रोटीन विटामिन के साथ...
फैल जाती हैं सुवास सी....
देह के हर कोने में...
पहुँच जाती हैं....
साँस के हर शोर में....
चुनने लगती हैं वायु के कण...
हर माँसपेशी, हर नस में फैल जाती हैं...
कितने बीते हैं...
कितने रीते हैं....
कचोटती रहती हैं यादें....
सिंकती रहती हैं सिगड़ी पर...
पिया रंगरसिया की धुन पर....
यादें कहीं नहीं जातीं...
जाने वालों के साथ...
अलगनी पर सूखती रहती हैं...
गीले कपड़ों सी...
कुकर में पकती रहती हैं...
गोभी की सब्जी और दाल के साथ....
रंग-ओ-रोशनी के साथ हर बार आती हैं...
दस्तक देने दरवाज़े पर...
और बस वैसे ही लौट जाती हैं वापस...
प्राणायाम की गहरी साँसों के साथ....
यादें कभी नहीं लौटतीं....
दरवाजे़ से सटी झाँकती रहती हैं...
इस उम्मीद में
कि
शायद एक दिन बुला लो तुम उन्हें...!
अनुजा
कविता विहान में प्रकाशित