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शनिवार, 6 मई 2023

छोड़ो कल की बातें......ओ हिन्दुस्तानी....!

आजकल बेकार हूं। बेकार मतलब काम नहीं है कुछ.......मतलब काम की तलाश में हूं। एज़ यूज़ुअल....हमेशा की तरह। किसी के लिए कोई नई बात नहीं है.....मेरे लिए भी नहीं। अक्सर ही ऐसा होता है।.....को कहि सके बड़ेन को, लिहाज़ा मुझमें ही कोई दोष होगा, ये भाग्यवादी बात है। व्यवस्था में गड़बड़ी है, ये क्रान्तिकारी बात है। खैर! जो भी हो मगर कुल जमा सच यह कि मैं बेकार हूं इन दिनों। 

पर बेकारी कभी बेकार नहीं होती। आप कुछ कर रहे होते हैं, यह भी सच नहीं है पर  आप कुछ नहीं कर रहे होते हैं यह भी सच नहीं है। मैं सीख और समझ रही हूं बदलावों को। कोई इसे छापेगा.......? पता नहीं! पर फिर भी लिख रही हूं। 

कोई गुस्सा है? नहीं है। कोई दुःख है ? नहीं, वो भी नहीं है। 

फिर क्या है- शून्य? नहीं, वह भी नहीं है। 

दरअसल हर बार जब बेकार होती हूं, काम की तलाश कर रही होती हूं, तो कुछ जान रही होती हूं। कुछ अपने को, कुछ जग को। पहले स्वतंत्र भारत में ‘कांव कांव’ एक काॅलम निकलता था। और भी अखबारों में निकलता था काॅलम, व्यंग्य का। जिसमें हम जैसे दुखियारे पीड़ित अपना क्षोभ निकाल लेते थे दूसरों पर हंसकर। अब अखबारों ने वह गुंजाइश भी खत्म कर दी। अखबार उत्पाद बन गए और संपादक उत्पादक। तो अब हम हो गए कच्चा माल। अगर हमसे उत्पाद अच्छा बनेगा तो हमें डाला जाएगा। कम से अच्छा बनेगा तो कम और ज्यादा से अच्छा बनेगा तो ज्यादा। मगर हमारा अनुपात तय करने का अधिकार उत्पादक को ही है। 

आज जी चाह रहा था कि हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान.....को जी भरकर कोसूं। मगर कहीं सांप्रदायिकता न फैल जाए और कोई हिन्दू ख़ुमैनी हमारा सर क़लम करने का फतवा दिए बिना ही कहीं हमारा सर न क़लम कर दें यह भी डर सता रहा है। हम तो ऐसा कुछ लिख भी नहीं रहे। जब तस्लीमा को शरण नहीं मिली तो हमारा तो भगवान ही मालिक है। 

खैर! वो जो भी हो। बात दरअसल यह है कि हर बार की बेकारी से जो शाश्वत बात समझ में आती है वो है अपना हिन्दी का जानकार होना मगर अंग्रेजी दां न होना। हर बार जब नौकरी करती हूं या नौकरी ढूंढने के काम करती हूं तो पता लगता है कि हमने तो सारा वक्त यों ही गंवा दिया है। हमें तो कुछ आता नहीं, क्योंकि हमें अंग्रेजी नहीं आती। 

हर बार हमारे हिस्से का इंक्रीमेंट अंग्रेजी वाले को मिल जाता है। काम हम करते हैं और वाहवाही उसे मिलती है जो रिपोर्ट पेश करता है। हमारा उपयोग तो हिन्दी को भुनाने भर का है। 

गए छह महीनों में कितनों से मांगा है काम। अनुवाद और दस्तावेजीकरण। मीडिया और सामाजिक विकास के क्षेत्र में। मगर हर जगह ये मुई अंग्रेजी ही रानी बनी बैठी है। सबको यह समझाते समझाते थक चुकी हूं कि भैये, तुम हिन्दुस्तान में काम कर रहे हो। और आधे से ज्यादा हिन्दुस्तान अंग्रेजी तो छोड़ो ठीक से हिन्दी भी पढ़ना नहीं जानता। तो ये जो सरकारी नीतियों के, उनकी आलोचना और व्याख्या, टीका टिप्पणी के ‘डाॅक्यूमेंट’ बनाते हो न उनका ‘दस्तावेजीकरण’ भी कर दो। भैये, जिसके लिए काम कर रहे हो उसे तो कुछ पता ही नहीं कि कहां क्या चल रहा है। भैये, जरा हिन्दी पर भी अपनी कृपादृष्टि करो। मगर हमारी दाल कहीं नहीं गलती। 

और हिन्दी के विकास के लिए बड़े बड़े सम्मेलन हो रहे हैं फाइव स्टार होटलों में पूरी निष्ठा के साथ। अब भला इनसे कोई ये पूछे कि हर नौकरी के विज्ञापन में अंग्रेजी में फ्लूएंसी क्यों मांगी जाती है? अंग्रेजी में काम करने वाली संस्थाओं और कंपनियों में अच्छे पैसे क्यों मिलते हैं? हर हिन्दी बोलने वाले को हम अंग्रेजी में क्यों डराते हैं? हिन्दी वालों के साथ उनके लिए किए गए काम की रपट हम अंग्रेजी में क्यों बनाते हैं। अंगे्रजी अखबारों से खबर टीपकर उसका हिन्दी में अनुवाद करके हम नए अखबार क्यों निकालते हैं? अखबारों के लिए हमें खबरनवीसों के बजाय अनुवादकों की जरूरत क्यों होती है?

एक बहुत बड़ा नेटवर्क (हिन्दी में इसके लिए कोई शब्द नहीं है.....या शायद कार्यजाल हो सकता है) है, हिन्दुस्तान की उन तमाम सरकारी नीतियों पर नज़र रखता है जो गरीब हिंदी जानने वाले आदमी की प्रगति और विकास के लिए बनायी गयी हैं। मगर आप उनके दफ़्तर में चले जाओ। एक भी काग़ज़ या आदमी हिंदी में नहीं मिलेगा। एक साहिब तमाम मुद्दों को लेकर पैरवी करते हैं। उनको बहुत समझाया- ‘भाईसाहब, इतना काम कर रहे हो, जिसके लिए कर रहे हो, उसे कुछ पता ही नहीं। तो ये सारा हिन्दी में करा डालो, उसका भी भला होगा और हमारा भी काम चलेगा।’ वो बोले- ‘ हां कराना तो है मगर अभी पता नहीं कि कब करा पाएंगे। जब कराएंगे तो आपसे संपर्क करेंगे।’ आज तक वो तय ही नहीं करा पाए कि काम भी कराना है हिन्दी में। 

एक साहब ने दया करके हमें बुलाया, आप हमारी रिपोर्ट बना दो और छपा दो। हमने जाकर उनका काम देखा, रपट लिखी। हिन्दी अखबार में दी। उन्होंने कहा कि हां, हम छापेंगे तो, ज़रा समय लगेगा। उधर बेचारे हमारे साथी पर पैसा देने वालों ने अंग्रेजी में धान बो दिया और लगे सीएनएन को फोन लगाने। अब बेचारी हमारी हिन्दी की क्या बिसात। अब तो हिन्दी भी हिन्दी की बात करते कतराती है। अंग्रेजी वाले हिन्दी वालों के विकास के लिए किए जाने वाले कामों की खबर को खास खबर बताते हैं और हिन्दी वाले 

शाहरूख-शोएब, सेंसेक्स-चिदंबरम, सोनिया-माया-जया-आडवानी को। समझ में नहीं आया कि मसला क्या है? पंडित जी से पूछा, कहे- बेटा, जिसके पास जो नहीं होता न वो उसी के पीछे भागता है। अंगे्रजी के पास दरिद्रता नहीं तो वह दरिद्रता से कमाता है, ऐश करता है। हिन्दी वाले के पास ऐश्वर्य नहीं तो वह उसकी बात कर जितना पाता है उसमें संतोष ढूंढने, और के लिए हाथ पांव मारने की कोशिश करता है। 

वो तो ठीक है पंडित जी मगर हम क्या करें। हम तो ‘न खुदा ही मिला न विसाले सनम' 

न इधर के रहे न उधर के रहे’ वाली स्थिति में फंस गए हैं। अंग्रेजी हमारे पास है नहीं कि हम इस महंगाई का मुकाबला कर सकें और हिन्दी हमें इतनी ताकत देती नहीं कि इस महंगाई से लड़ सकें। तो हम क्या करें? अब तो दाल रोटी खाओ प्रभु के गुन गाओ भी नहीं कह सकते। दाल का भी मोल चुकाने लायक नहीं रह गए हैं। 

तो बच्चा भूखे ही रहो और प्रभु के गुन गाओ। पंडित जी सिधारे। 

(कुछ पुराने पन्नों से....)

अनुजा

रविवार, 14 अगस्त 2022

कौन आज़ाद हुआ.....किसके माथे की सियाही छूटी.....!


पिछले दो दिनों से अक्सर दिन ढले रात को बाहर से लौटना होता है.....शहर के एक सिरे से दूसरे सिरे के बीच में बसा शहर दुल्हन की तरह सजा है...! रौशनी और रंगों से सराबोर है शहर...! तिरंगों की दुकानें सजी हैं....! शहर के दिल हज़रतगंज में मोती महल और राॅयल कैफे के बाहर लोग खाने पीने और आनंद लेने में मस्त हैं....! यकीनन कुछ ऐसा ही नज़ारा होगा शहर के दूसरे हिस्सों में जो घूमने फिरने और खाने के लिए बने हैं....ऐसी कल्पना कर लेती हूं। गोमती रंगों से लबरेज़ है....! पर लालबाग अमीनाबाद और मौलवीगंज, यहियागंज, रकाबगंज, नादान महल रोड के छोटे दुकानदारों की दुकानों के बंद हो जाने के बाद सड़क पर अंधेरा है। ऐसे ही शहर के और दूसरे इलाके होंगे, जहां छोटे दुकानदार हैं....और जो दिन में रौनकों से भरे रहते हैं...पर दुकानें बंद होने के बाद ये इलाके अंधेरे में डूब जाते हैं....! यहां रौशनी की कोई समंदर नहीं है...! रौशनी नए लखनऊ, नई इमारतों, बड़े शोरूम्स, माॅल, पार्कों में जगमगा रही है....पर छोटे गरीबों और मध्यमवर्गीय इलाकों में अंधेरों का वही रंग बदस्तूर जारी है। मध्यमवर्गीय घरों में वोल्टेज की समस्या है....बिजली के आने न आने की समस्या है...बिजली चोरों की कारस्तानियां अभी भी जारी हैं....ईमानदार उमस और गर्मी में झूल रहे हैं.....ऐसा और भी बहुत से शहरों में भी होगा....मैं यक़ीन से कह सकती हूं.....पर हम आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं। 

अच्छी बात है कि हम आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं....! सरकार और सहयोगियों ने उसके जश्न में कोई कमी नहीं रहने दी है....! अच्छा लगता है....पर मुन्नू और मिश्रा जी, गुप्ता जी, अग्रवाल जी, पाल जी वगैरा-वगैरा के घर में अभी भी बदहाली ही है....! कुछ महंगाई से....कुछ गरीबी से....कुछ बेरोज़गारी से....तंगहाल परिवार में रानों की अम्मा अभी भी मार ही खा रही है....!  क्या ही अच्छा होता कि रौशनी से शहर को सराबोर करने में मदद करने वाले मददगारों के घर और मन, जीवन भी रौशन होते...! हर हाथ के पास काम होता....हर आंगन में खुशियां होती....!

लीजिए, हम कह ही रहे थे और ट्रांसफार्मर भड़ से उड़ गया....! अब हम भी अंधेरे में बैठ रौशनी की दुहाई दे रहे हैं....! बिजली वालों को फोन किया जाएगा....वो आते-आते आएंगे....बमुश्किल बिजली ठीक होगी और तब तक हम मौसम की उमस का मज़ा लेंगे । 

आज़ादी के 75 बरस का हासिल कुछ भी नहीं है....ऐसा नहीं कहा जा सकता...! जितनी सरकारें आईं...सबने कुछ न कुछ किया....! वैचारिक मतभेद चाहे जितना हो सबने कुछ न कुछ किया ही देश और देशवासियों को विकास की ओर ले जाने के लिए....! तब ही हम आज मोबाइल और इंटरनेट के युग में हैं....तब ही पुरानी और नई पीढ़ी में ढेरों मतभेद हैं...हवा नई है...! मंहगाई का रोना हर बार की तरह वही है....! यह तो होता ही है...दस बरस बाद पीढ़ी बदल जाती है...बहुत कुछ पीछे छूट जाता है, बहुत कुछ आगे आ जाता है....पर कुछ ऐसा है...जो कभी नहीं बदलता...अलग-अलग शक्लों में सब कहीं आज भी वैसा ही है।

हर कोई अपनी सोच, समझ और विचारधारा के अनुरूप चीज़ें ठीक करने की कोशिश करता रहा, करीं भी ! ....किसी की मंशा पर शक नहीं किया जा सकता । पर फिर क्या है कि अभी भी रानो की अम्मा मार खाती है....इंद्र को मटकी से पानी पीने के लिए मार दिया जाता है....निर्भयाएं बलात्कार का दंश सहती हैं...मर भी जाती है..., कुछ मन से, कुछ तन से भी....., कितने युवा, प्रौढ़ बेरोज़गार हैं.....भिखारियों की संख्या बढ़ती जाती है.....प्रकृति के आवरण में छेद बढ़ता ही जाता है....पड़ोसी की छत पर लगे तिरंगे को बंदर नोच फाड़ जाता है....! ये किसका स्वार्थ है....हमारा, सरकार का, या राजनीति का.....! 

तो आज़ादी के इस अमृत महोत्सव को किसके लिए मनाया जा रहा है, कौन मना रहा है....? क्या वो, जिनके लिए महोत्सव और उत्सव का मतलब केवल महंगे बाज़ारों में अपनी कारों में घूमना, खाना पीना फिल्म देखना भर है...., या उनके लिए जो यह तय करते हैं कि लाल सिंह चड्ढा देखी जाएगी, कश्मीर फाइल्स देखी जाएगी या नहीं देखी जाएगी....! 

किसी ने कहा, यदि हमें अंदाज़ा होता कि आज़ादी के लिए लड़ने वालों ने क्या प्रताड़नाएं, और क्या अत्याचार झेला है तो हम निश्चय ही आज़ादी के जश्न में शामिल होेते......! तो क्या माना जाए कि जो इस उत्सव में शामिल हो छुट्टियों का मज़ा ले रहे हैं, उनको इसका अंदाज़ा है कि आज़ाद भारत का दिन दिखाने के लिए हमारे पूर्वजों ने क्या सहा है? मुझे नहीं लगता कि ऐसा है । आज़ादी  का पर्व हो या कोई सांस्कृतिक पर्व....कामगारों के लिए वह एक छुट्टी का दिन होता है...आगे पीछे छुट्टियां हैं तो घर वापस जाने का मौका....बाहर घूमने का मौका....या फिर होटलों और बाज़ारों की आय बढ़ाने का मौका....! 75 बरसों में ही आज़ादी के उत्सव के मायने बदल चुके हैं। 

अच्छा लगता है देखकर कि सरकार ने आह्वान किया कि हर घर तिरंगा हो....सरकार और उनके नुमाइंदों ने रौशनी की चादर फैला दी चारों तरफ...! देश ने साथ भी दिया....! पर क्या युवाओं को शांति, प्रेम और न्याय का वह संदेश मिला है...जिसकी बेहद ज़रूरत है....! क्या हम पूरी तरह भयमुक्त और लोकतांत्रिक व्यवस्था में रह रहे हैं? क्या देश की आज़ादी का अमृत महोत्सव प्रकृति की सुरक्षा संरक्षा का संदेश दे पाया है....? हमारे युवा जिनके हाथों में इसे आगे ले जाने की बागडोर है क्या मनुष्य बन पाए हैं....क्या प्रकृति का हिस्सा बन पाए हैं....? या इस उत्सव के बाद हम फिर वापस उसी उपभोक्तावाद में डूब जाने वाले हैं....? या क्या हम आज भी उपभोक्तावाद की छत्रछाया में आज़ादी का अमृत महोत्सव नहीं मना रहे हैं....यह विचार करने की बात है.....! नहीं, मुझे आज़ादी के महोत्सव में उत्सव और आनंद मनाने से कोई गुरेज नहीं है....! पर इसमें जो पीछे छूट गए हैं.....उनको साथ लाने की दरकार ज़रूर है.....! यह आज़ादी का अमृत महोत्सव तब ही पूरी तरह से जगमगाएगा....जब बहुत से छूट गए मूलभूत प्रश्नों का हल खोज लिया जाएगा....!  


अनुजा