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शनिवार, 12 सितंबर 2026

'मानस के हंस’ की तलाश में मिर्ज़ा मण्डी


चौक धड़कन है शहर की । चौक आईना है लखनवी विरासत का । चौक के कोने-कोने से झांकता है लखनऊ और इसी चौक की बान वाली गली की मिर्ज़ा मण्डी में मकान....नहीं
] हवेली है ‘चौक यूनि
वर्सिटी’ के उस प्रखर विद्यार्थी की
] जिसकी कलम के द्वन्द्व की गवाह रही हैं उस हवेली की दीवारें] उसका आँगन । वो विद्यार्थी] जिसकी गणना साहित्य-जगत लखनऊ की लेखक-त्रयी में करता है और जिसे शहर अमृतलाल नागर के नाम से जानता है।

आज सन्नाटे में खड़ी हैं वक्त की नब्ज़ पर हाथ रखकर एक-एक पल का हिसाब रखने वाली हवेली। इतिहास में नाम दर्ज कराने वाले अनेक उपन्यासों की रचना प्रक्रिया में साझीदार रही हैं उस हवेली की दीवारें। आज वीरानी में] अकेलेपन से बतियाते हुए उन सारे शब्दों की प्रतिध्वनियों को सुनती है यह हवेली और तलाश करती है ‘मानस के हंस’ के उजले पंखों की फड़फड़ाहट को] किसी भटकती आत्मा के समान।

शहर की विरासत वैसे भी परिवार में उपेक्षित किसी बुज़ुर्ग की तरह पुरानी चीजों को उलटने-पलटने में व्यस्त है। न उससे बात करने वाला कोई है, न उसके बारे में सोचने वाला। सब अपने काल्पनिक सुनहरे भविष्य को पाने की अंधी दौड़ में लगे हैं।

पुराने लखनऊ की अधिकांश इमारतें और मकान स्थापत्य कला के नमूने कहे जा सकते हैं। अमृत लाल नागर की यह हवेली भी स्थापत्य कला का एक उदाहरण है। इसमें लगे टेराकोटा के खंभे और खूबसूरत जालियाँ सामान्य इमारतों में इस्तेमाल नहीं की गयी हैं।

इस हवेली की ऐतिहासिकता सिर्फ इसी परिप्रेक्ष्य में ही नहीं है कि यहाँ लखनऊ के उस उपन्यासकार ने अंतिम साँसें ली हैं जिसने लखनऊ को ‘हिन्दी का गढ़’ बनाने में अभूतपूर्व योगदान दिया है, बल्कि यह भी ऐतिहासिक महत्व की बात है कि यह कोठी आसफुद्दौला इमामबाड़े के साथ बनी है । नवाबों के ‘फैमिली बैंकर’ शैफुद्दौला से यह कोठी शाह मदन मोहन ने खरीदी थी । इसकी ऐतिहासिकता यह भी है कि यहाँ से आखिरी बार नेपाल के लिए जाते हुए बेगम हज़रतमहल इस कोठी के एक हिस्से में एक रात के लिए ठहरी थीं। सन् 1909 में शाह मदन मोहन ने यहाँ ‘लक्ष्मण साहित्य सदन’ की स्थापना की भी और यहाँ से नौ पुस्तकें भी छपी थीं। बाद में स्व. अमृतलाल नागर ने भी अपना अधिकांश लेखन-कार्य इसी कोठी में किया। नागर जी चौक में तीन मकानों में रहे। इस तीसरे मकान में वो 1957 के दिसम्बर माह में आए थे] जब उनकी पुत्री अचला का विवाह होना था। उस समय वो ‘शतरंज के मोहरे’ लिख रहे थे। उसके बाद अपनी अंतिम साँसों तक वो उसी कोठी से बँधे रहे।

आज सुनसान और बदहाल पड़ी है स्व. अमृतलाल नागर के 1958&90 तक के लेखकीय जीवन की गवाह वो कोठी। चौक साहित्य और संस्कृति का केन्द्र था कभी। ‘जैन दिगम्बर’ और ‘प्रबोधिनी परि’द’ नामक दो पुस्तकालय थे चौक में] जहां से नागर जी ने अध्ययन प्रारम्भ किया था] अब वहाँ इन पुस्तकालयों का नाम-ओ-निशान भी नहीं है।

^शहर में सांस्कृतिक शून्यता बढ़ रही है’] शिकायत करते हैं शरद नागर] स्व. अमृतलाल नागर के छोटे पुत्र। मुझे याद आते हैं मुद्रा जी। कुछ दिन पहले उन्होंने भी यही शिकायत की थी। लोग अपनी विरासत से कट रहे हैं] निर्लिप्त हो रहे हैं। उनमें पहचान नहीं बची है। ‘उस घर में अब कौन रहता है\* मेरी जिज्ञासा नहीं रुकती। कभी देखी थी एक झलक उस घर की...बाहर से। कई बार गुज़री हूं उसके सामने से। सुना है रूपनारायण पाण्डेय के घर ‘शतदल’ में गोष्ठियां हुआ करती थीं। खेतगली में रहते थे रूपनारायण पाण्डेय-रानी कटरा में। कई बार गई हूं उस घर में] भीतर तक। रूपनारायण पाण्डेय का परिवार रहता है वहां। काफी अच्छी स्थिति में देखा है हमेशा उस घर को। पर नागर जी का घर। वो कैसा है] किस स्थिति में है] यह जानने की इच्छा दबी नहीं रह पाती। पता चलता है] वहां कोई नहीं रहता। उसकी व्यवस्था के बारे में जानना चाहती हूं तो आक्रोश फूट पड़ता है शरद जी का ‘क्यों जानना चाहती हैं आप\ क्या फायदा है इस सब का\] लगता है किसी दुखते ज़ख़्म पर हाथ रख दिया था। सहमे हुए अगले प्रश्न के साथ फिर प्रवाहित होता है आक्रोश-’अमृतलाल नागर का वोट बैंक नहीं है] इसलिए उन्हें याद करने की फुर्सत नहीं है किसी को। सौन्दर्यीकरण हो रहा है शहर का। इसके तहत ऐतिहासिक विभूतियों की प्रतिमाएं लग रही हैं। ऊदा देवी और बिजली पासी के ऐतिहासिक योगदान की याद की जा रही है पर अमृतलाल नागर की ऐतिहासिकता] उनका योगदान नहीं याद आता किसी को। आज बस उन्हीं की चर्चा की जा रही है] जो वोट बैंक को बढ़ा सकें। उनकी याद किसी को नहीं आती] जिनका कोई वोट बैंक नहीं है।’ उपयोगिता से जुड़ गई है ऐतिहासिकता। ‘बाबू जी की मृत्यु के समय जब विधानसभा में शोक प्रस्ताव पास हुआ था उस समय इस आवास को संग्रहालय बनाने का प्रस्ताव रखा गया था और तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने इस प्रस्ताव पर विचार करने का आश्वासन भी दिया था पर वो सब ठंडे बस्ते में चला गया।’ शरद जी बताते हैं।

'अमृतलाल नागर के नाम पर चौक में मुक्ताकाशी रंगशाला बनाने की भी योजना थी। उनके नाम का पत्थर भी लगाया गया था वहां, पर अब वह ज्योतिबा फुले के नाम पर बना हुआ है।’ बताते हैं कुमुद नागर जी] ^और सब बात तो छोड़ दें। आपको बताएं] स्व. मदन नागर ‘म्युनिसिपिल आर्ट गैलरी’ की स्थापना करने वालों में मुख्य थे। उस समय उन्होंने वहां जो पेंटिंग्स इकट्ठा की थीं] वो लखनऊ की चित्रकला का सवश्रेष्ठ नमूना थीं। आज ख़त्म है वो सब। पता नहीं क्या हुआ\ सारी पेंटिंग्स त्रिलोक हाउस के पीछे के कमरे में बंद पड़ी हैं। खुद मदन नागर की सारी पेंटिंग्स का कोई पुरसाहाल नहीं है। सब धीरे-धीरे खात्मे की ओर बढ़ रही हैं। जब कृतियों की रक्षा नहीं की जा सकती तो अवशेषों को कौन पूछेगा\*

न जाने कितनी बार शरद नागर ने विकास नगर की तीन मुख्य सड़कों का नाम अमृतलाल नागर] भगवती चरण वर्मा और यशपाल के नाम पर करने का प्रस्ताव सरकार के पास भेजा है। कुमुद नागर ने भी रिंग रोड का नाम अमृतलाल नागर के नाम पर करने का प्रस्ताव सरकार के पास भेजा है पर कभी भी इस बात पर ध्यान नहीं दिया गया। शिकायत सिर्फ अमृतलाल नागर के लिए नहीं है इनकी। कुमुद नागर जी कहते हैं-’मजाज़] भातखण्डे] कालिका प्रसाद] बिन्दादीन महाराज] यशपाल] भगवती बाबू] डा.श्याम सुंदर दास] रूपनारायण पाण्डे] कालीदास कपूर (सरस्वती के नियमित समीक्षक/लेखक)] दुलारे लाल भार्गव और भी न जाने कितनी ऐसी हस्तियां जो लखनवी कला] संस्कृति] साहित्य की पहचान हैं] उन्हें कौन याद करता है\ उन्हें भूलते जा रहे हैं हम। ये सारे ऐसे नाम हैं] जिन्हें ‘प्रिज़र्व’ किया जाना चाहिए पर किसको आती है सुधि। प्रेमचन्द] निराला की भी यह कर्मभूमि है पर उनकी भी किसी को याद नहीं आती।’ याद आता है मुझे गढ़ाकोला में निराला का घर] चन्द्रशेखर ‘आज़ाद’] भगतसिंह] बिस्मिल] अशफ़ाक उल्ला खां का घर] जिनकी बरबादी की दास्तानें अखबारों की सुर्खियों में कई बार आती हैं। पढ़ीस जी की जन्म शताब्दी निकल जाती है खामोशी से] हवा भी नहीं सरसराती।

दरअसल] जिन संस्थाओं को काम है यह] हिंदी संस्थान] ललित कला अकादमी] ये सब मृत हैं। पूरी धरोहर को संजोकर] सहेजकर रखने के लिए बनायी गई हैं ये संस्थाएं] सिर्फ गोष्ठी] अनुदान या प्रकाशन ही इनका दायित्व नहीं है। पर इन संस्थाओं में तो साहित्य व संस्कृतिकर्मियों के पूरे फोटो भी नहीं मिलेंगे। श्री नारायण चतुर्वेदी की तस्वीर की ज़रूरत जब पड़ी हिंदी संस्थान को तो शरद नागर के पास से मंगाई गई।

^जहां ये भदेसपन हो वहां क्या उम्मीद की जाए\ जनसंकुल क्षेत्रों में किसी सांस्कृतिक केन्द्र की स्थापना होनी चाहिए। स्व. नागर जी के आवास को नागर जी के नाम पर पुराने लखनऊ की सांस्कृतिक-साहित्यिक संपदा का केन्द्र बनाने का प्रस्ताव भी दिया गया था पर कोई सुनवाई नहीं हुई’] शरद नागर की कुंठा बिखर रही है निरंतर।

शरद नागर पैर से लाचार हैं। अब उस घर की देखभाल उनके वश की बात नहीं है।’शायद किराये का घर होने की वजह से सरकार इस प्रकार के प्रस्तावों की ओर कोई ध्यान नहीं दे रही है। हां] मिर्ज़ामण्डी के सामने एक ‘अमृत बाज़ार’ बनाने का प्रस्ताव दिया था नगर विकास मंत्री लाल जी टण्डन ने और उसी में अमृतलाल नागर का आॅडिटोरियम बनाने का भी वायदा किया था पर अब पता नहीं क्या हुआ\ मैं तो दो बरस से इस घर से निकल नहीं पाया हूं’] बताते हैं शरद जी। ‘शिक्षा के साथ संस्कृति का समन्वय ज़रूरी है। विरासत के प्रति जागरूकता लाने के लिए तो प्रयास करने पड़ेंगे।’ बहरहाल] कुल जमा बात यह है कि बदलते हुए समय की गति ने न तो चौक को ‘यूनिवर्सिटी’ रहने दिया है और ना ही वो नागर जी के मकान के अवशेषों को बचा पाएगी। चौक की पहचान के साथ नफ़ासत-नज़ाकत के साथ] मक्खन और चाट के साथ] इमारतों और बागों के साथ] तहज़ीब-ओ-तमीज़ के साथ] रेवड़ियों] मिठाइयों] ठंडाई के साथ] चिकन व ज़रदोज़ी के साथ बिछुड़ रहा है लखनऊ अपनी ‘चौक यूनिवर्सिटी’ के इस प्रखर विद्यार्थी की पहचान से भी। सूने पड़े आंगन में अब मृत होती स्मृतियों की परछाइयां ही रह गई हैं। कभी जो दीवारें ‘चकल्लस’ की बैठकों से गुंजायमान रहती थीं] वो कमरे] जो उस क़लमनवीस के चिंतन से रूबरू होते थे] अब समय की क्रूर परतों में दबने के लिए तैयार खड़े हैं और हम विवश हैं उसे चुपचाप खामोशी से मिटते देखने को।


अनुजा

गुरुवार, 10 सितंबर 2026

करवाचौथ और नारी मुक्ति

^राज] मुझे भूख लगी है.....।’

लो] चुपके से खा लो।

नहीं] मेरा व्रत है.... करवाचौथ का....

मत खाओ....।

कुछ क्षणों के बाद।

राज] चांद नहीं निकला अभी तक.....।

मुझे ज़ोर की भूख लग रही है।

तो मैं क्या करूं\ मैंने कहा था व्रत करने के लिए....।

ऐ सिमरन! 

हूं.....

चांद....

कहां.....

वो] निकल आया.....

ये दृश्य है एक हिंदी फिल्म का। विदेश में जन्मी पली-बढ़ी एक हिंदुस्तानी लड़की अपने ब्याह के वक्त पहली बार हिंदुस्तान आती है। भारतीय मूल के अपने विदेशी प्रेमी के लिए करवाचौथ का व्रत करती है] विवाह से पहले। यह एक पंजाबी परिवार है। वैसे अमूमन हिंदू परिवारों में विवाह के बाद करवाचौथ करने की परंपरा है। उत्तर भारत में विवाहित स्त्री के लिए करवाचौथ अनिवार्य व्रत है। मान्यता है कि सुहागिनें इसे अपने पति की दीर्घायु व शुभेच्छा से रखती हैं।

भारतीय व्रत-उपवासों में पर्वों की श्रृंखला का यदि अवलोकन करें] तो पाएंगे कि अधिकाश व्रत-पूजा पर्व स्त्रियों के लिए बनाए गए हैं पुरुषों की शुभेच्छा में। फिर वो पुरुष चाहे पति हो] भाई हो या पुत्र। हां] पिता अभी इससे बचे हुए हैं। करवाचौथ इन व्रत उपवासों की श्रृंखला का प्रमुख पर्व है। अन्य व्रतों को यदि स्त्रियां भूल भी जाएं] तो क्षम्य है] किंतु करवाचौथ की अवहेलना उनके लिए क्षम्य नहीं है] और इस दिशा में सबसे अहम् भूमिका पति गृह की अन्य बड़ी-बूढ़ी महिलाएं (सास] ननद] जिठानी) ही निभाती हैं। सारे दिन के निर्जल व्रत के उपरांत ज़ेवर] गहनों] भारी कपड़ों की लकदक] सिंदूर] आलता] मेंहदी से श्रृंगार कर के महिलाएं संध्या होते ही चांद निकलने की बेसब्री से प्रतीक्षा करने लगती हैं। चांद के निकलते ही] आकाश में चढ़ने से पहले ही पहले उसे अर्घ्य देकर उसकी पूजाकर पति की आरती उतार] पति सहित अन्य बड़े-बुज़ुर्गों के चरण-स्पर्श कर ‘दूधो नहाओ] पूतों फलो’ के आशीर्वाद के मध्य गद्गद् होती महिलाएं अपना व्रत तोड़ती हैं।

यदि परिवार में कोई नवेली बहू है तब तो इस पर्व का आडंबर कुछ और ही बढ़ जाता है। नवेली बहू के पितृगृह से ‘करवा’(टोटीदार लोटेनुमा पात्र) आता है। अब ‘करवा’ अकेला तो आएगा नहीं, उसके साथ वधू के पितृगृह की सामर्थ्य अनुसार केवल वर-वधू या अन्य परिवार परिजन के लिए वस्त्राभूषण] मिठाई] रुपए व अन्य जो कुछ अपेक्षित] इच्छित हो] आएगा। न आने की दशा में बहू को सुनना पड़ सकता है-‘किस कंगले घर से आयी है। विदा करके ही बाप ने छुट्टी पा ली....इत्यादि व ऐसी ही अन्य कटु बातें। इस प्रकार लेन-देन की परंपराजन्य भी हो सकता है यह पर्व ।

स्थितियां कई हो सकती हैं। आधारशिला की दृढ़ता के प्रत्यय से हटकर वैसे भी अब समाज ऊपरी दिखावे की संस्कृति की ओर अधिक उन्मुख हो रहा है। ऐसे में व्रत-पर्वों का ‘ग्लैमर’ कुछ और ही बढ़ जाता है। अपेक्षाएं और भी बढ़ जाती हैं, पर तेजी से फैलती आधुनिकता के इस युग में यह आवश्यक है कि इन व्रत-पर्वों के औचित्य और तार्किकता पर प्रश्न उठाए जाएं।

करवाचौथ से जुड़ी मान्यताएं शायद किसी युग में तार्किक प्रतीत होती हों, पर आज जब हम 21वीं सदी के मुहाने पर कंप्यूटर संस्कृति के साथ खड़े हैं और स्त्री-पुरुष समानता की बातें हो रही हैं, आज जब स्त्री एवरेस्ट से लेकर चांद की ऊंचाइयों को नाप चुकी है। समुद्र से लेकर इंग्लिश चैनल तक की गहराइयों की खाक छान चुकी है तब ये बातें हास्यास्पद प्रतीत होती हैं।

कुछ परंपरावादी इसे अनावश्यक आधुनिक और अपसांस्कृतिक रवैया कह सकते हैं। पंडिताई और प्रबुद्धता का जामा ओढ़े कुछ लोग इसे अज्ञानता और धर्मच्युतता का रूप मान सकते हैं। पर इन सारे प्रश्नों और आशंकाओं के उत्तर इसी सांस्कृतिक विचारधारा में मौजूद हैं। अपनी संस्कृति की आधुनिकता और प्रामाणिकता को स्वीकार करके भी हम उसकी घोषणा करने से हिचक रहे हैं। यह आत्महीनता है कि हम अपना कुछ भी बेहतर न मानकर खुद को इन अतार्किक परंपराओं में उलझाए रहते हैं और इन्हीं परंपराओं के आधार पर खुद को महान साबित करने की कोशिश करते रहते हैं। कभी इनके मूल में नहीं जाते कि अपने ज्ञान को गतिशील आधुनिकता की कसौटी पर कस सकें।

इस प्रकार यदि हम भारतीय समाज की मान्यताओं व परंपराओं को अति रूढ़िवादी और अंधविश्वासी मान भी लें तो किसी व्रत-पर्व का किसी की आयु वृद्धि से किसी प्रकार का कोई संबंध नहीं जुड़ सकता। क्योंकि ज्योतिष गणना की वैज्ञानिकता का जिन लोगों को ठीक-ठीक ज्ञान है वे विद्वज्जन यह भली प्रकार जानते होंगे कि नवजात शिशु के जन्म के घड़ी पल का यदि एकदम सही ज्ञान हो तो उसके आधार पर जातक की संपूर्ण जीवन दशा और मृत्यु का क्षण व प्रकार भी उसी क्षण निश्चित हो जाता है] जब जातक का जन्म होता है। जातक की मृत्यु के विवरण के साथ ही जन्म-कुंडली का अंत होता है। तो इस प्रकार पति की मृत्यु का क्षण जब पत्नी के जन्म से पूर्व (भारतीय समाज में पत्नियां आयु में पतियों से एक दो बरस या दस बरस या इससे भी अधिक छोटी हो सकती हैं] भले ही वे इसके जैवकीय या सामाजिक कारण न जानते हों।) ही निश्चित हो जाता है तो पत्नी की व्रत-पूजा इसमें किसी प्रकार का संशोधन करके विधाता के विधान में दखल कैसे दे सकती है? आखिर पत्नी भी तो विधाता की एक कृति है।

अब अगर यह मान भी लिया जाए कि इसका पति के जीवन से कोई संबंध है तो तलाशें इसकी वजह कि भारतीय समाज में विधुर कम और विधवाएं अधिक क्यों हैं\ आखिर पति तो पत्नी की दीर्घायु के लिए कोई व्रत नहीं रहते। जब भारतीय समाज में पत्नियां करवाचौथ का व्रत हर वर्ष करके पति की दीर्घायु की कामना] प्रार्थना करती हैं तो पुरुष मृत्यु दर अधिक क्यों है\

दरअसल उसके अन्य कारण हैं। इस दौर में औसत आयु 60&70 वर्ष है। अब पति की आयु जब पत्नी से अधिक है तो वह अपनी औसत आयु प्राप्त करके मृत्यु को प्राप्त होगा ही। दूसरी बात पुरुष का कार्यक्षेत्र घर से बाहर है। समाज के पितृसत्तात्मक होने की वजह से सारी आर्थिक] सामाजिक व पारिवारिक ज़िम्मेदारियां पुरुष की हो जाती हैं। ऐसे में अत्यधिक मानसिक दबाव से वह अनेक रोगों का शिकार होता है। इसलिए भी मृत्युदर अधिक है। प्रकृति से सहनशील न होने के कारण वह इन सामाजिक] आर्थिक] पारिवारिक व व्यक्तिगत तनावों से मुक्ति पाने के लिए नशे का सहारा लेता है। ये नशे शराब] भांग] गांजा] अफीम] चरस] सिगरेट से लेकर अन्य आधुनिक नशों तक कुछ भी हो सकते हैं। ये भी वजह बनते हैं उसकी मृत्यु की। इसके अलावा कई बार घर-बाहर निकलते-बैठते वह आकस्मिक दुर्घटनाओं का भी शिकार होता है। अब इसमें स्त्री का योगदान कहां पर आता है जिसे उसने खुद अपने हाथ का खिलौना] अपनी मर्ज़ी की कठपुतली बना रखा है। पर इन कारणों की तह तक अशिक्षा से ग्रस्त धर्मभीरु] रूढ़िवादी] अंधविश्वासी और कुंठित भारतीय पत्नियां नहीं पहुंच सकती हैं। पति को परमेश्वर और पत्नी को दासी के प्रत्यय में बांधकर संस्कारों में इसी परिकल्पना को कूट-कूट कर भरने वाले भारतीय समाज के विधिवेत्ताओं ने सारे बेहतर निर्णय अपने (पुरुष के) पक्ष में रखे हैं। स्त्रियों को परतंत्रता के अटूट बंधन में बांध कर उन पर तरस खाने के लिए छोड़ दिया गया है। तभी तो तुलसी जैसे विद्वान रचयिताओं का यह दुस्साहस होता है कि एक ओर तो वे-

^ढोल] गंवार] शूद्र] पशु] नारी] सकल ताड़ना के अधिकारी।’ का राग अलापते हैं तो दूसरी ओर- ‘कत विधि सृजी नारि जग माहीं। पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं।।’ कहकर उस पर तरस खाते हुए अपना सारा दोष विधाता के माथे मढ़ देते हैं।

इस तरह रूढ़िवादिता से बंधे हुए हर सांस्कृतिक प्रश्न के उत्तर के लिए सभ्यता के विकास की पड़ताल आवश्यक हो जाती है। जिससे यह जाना जा सके कि वे कौन सी परिस्थितियां थीं जिन्होंने स्त्री को घर] धर्म] परंपरा] मर्यादा] परिवार की श्रृंखलाओं को दण्ड की तरह स्वीकार करने पर बाध्य किया। वे कौन सी विवशताएं थीं] जिन्होंने उसे पति व उसके परिवार में संगम की तीसरी धारा तरह अपना अस्तित्व विलीन कर लेने पर विवश किया। वे क्या स्थितियां थीं जिन्होंने उसकी कोई निजी पहचान नहीं रहने दी। वे क्या कारण थे कि उसके पक्ष में सदैव त्याग] बलिदान ही आया और दया] क्षमा] स्नेह] प्रेम] उदारता] ममता व सहनशीलता जैसे नैसर्गिक गुण उसके ही लिए अभिशाप बन गए। वो ‘व्यक्ति’ से ‘वस्तु’ में बदलती गई।

यह तो सच है कि सृजन की शिथिलता और शारीरिक संरचना की विवशताओं के चलते घर नामक वस्तु का निर्माण हुआ और स्त्री का यायावरी जीवन उसके हाथ से सरक गया। पर यह उसकी स्वतंत्रता पर बंधन नहीं था। वह पुरुष की सामंतवादी मानसिकता का शिकार नहीं थी। सभ्यता के विकास के साथ भिन्न-भिन्न संस्कृतियों का निर्माण शुरू हुआ। हर संस्कृति की पहचान के लिए कुछ परंपराएं बनी। क्षेत्र विशेष के वातावरण व प्राकृतिक संसाधनों के अनुरूप भोजन] वस्त्र के प्रकार ने भी भिन्नता का दर्शन निर्मित किया।

पर व्रत-पर्वों का सिलसिला इस संस्कृति में कब और कैसे शुरू हुआ] कुछ ठीक-ठीक कहा नहीं जा सकता। ना ही यह कहा जा सकता है ठीक-ठीक] कि यह कब औरतों के पक्ष में आ गया\ इसे पूर्णतः पुरुष बुद्धि की उपज भी नहीं माना जा सकता। संभव है गृहकार्यों की एकरसता से ऊबी स्त्रियों की बुद्धि ने ही इन्हें एक मनोरंजक कार्यक्रम के रूप में आरंभ किया हो पुरुष की सामंती प्रवृत्ति और उसके अहं को संतुष्ट करने के लिए] उसके अस्तित्व को बचाए रखने के कारण भी इसमें जोड़ दिए गए होंगे। किंतु बौद्धिक कौशल से उत्पन्न महिलाओं के मनोरंजन का यह कार्यक्रम कालांतर में संस्कृति का अनिवार्य अंग मान लिया गया। इस प्रकार पुरुष के अस्तित्व के स्थायित्व से जुड़ गया नारी के अस्तित्व के स्थायित्व का प्रश्न और उससे शुरु हुई उसे बनाए रखने की कामना की मृगतृष्णा।

किंतु यह तो तय है कि इस प्रकार के तर्कहीन व्रत-पर्व प्राचीन संस्कृति की देन नहीं हैं। क्योंकि भारतीय साहित्य के आधारभूत ग्रंथों ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ में इस प्रकार के किसी व्रत-पर्व का उल्लेख नहीं मिलता। हालांकि इस बात से पूर्णतः इन्कार भी नहीं किया जा सकता कि यह पुरुष की सामंतवादी मानसिकता की भी देन हो सकता है और शायद यह सच भी हो। वैसे] भारतीय समाज शक्ति पूजक होने के नाते स्वयं को मातृसत्तात्मक कहने का ढोंग भले ही रच ले] पर इसी समाज में न्याय प्रिय राम के युग में जहां बलात्कार और अपहरण जैसी घटनाएं घटी हैं वहीं स्त्रियां अग्निपरीक्षा और गृह निष्कासन जैसे शोषण का शिकार भी हुई हैं। इसी समाज में स्त्री को सार्वजनिक रूप से नग्न करने की घटनाएं भी घटी हैं। वो भी उस युग में जब संतानें मां के नाम से जानी जाती थीं। पिता का परिचय इतना महत्वपूर्ण नहीं था अर्थात समाज मातृसत्तात्मक माना जाता था। इसलिए ‘करवाचौथ* जैसे व्रत-उपवास इन्हीं शोषणों की या पुरुष के प्रभुत्व को स्थायी रखने के साधनों की एक कड़ी हो सकते हैं।

वैसे ‘करवाचौथ’ की सामाजिकता पर भी विचार करना ज़रूरी है। समाज के बदलते स्वरूप पर भी विचार करना ज़रूरी है। समाज के बदलते स्वरूप के साथ हमारी सामाजिक परंपराएं भी बदलती रहती हैं। आज हम जहां खड़े हैं] वहां बहुत कुछ पुराना छोड़ चुके हैं। नया ग्रहण कर चुके हैं] ग्रहण कर रहे हैं। इसलिए यह भी संभव है कि किन्हीं सामाजिक] सांस्कृतिक परिस्थितियों से उपजा यह ‘करवाचौथ’ स्त्री से उसके अस्तित्व की पहचान के रूप में जुड़ गया हो। इस संदर्भ में श्रीमती किरण मिश्र का कहना है कि जैन] बौद्ध धर्मों के जन्मकाल में उन्हें हिंदू धर्म पर मंडराता हुआ ख़तरा मानकर उपनिषदों] पुराणों से छोटी-छोटी कहानियां निकाल कर इन व्रत-पर्वों का प्रचलन किया गया होगा। सामाजिक परिवर्तन की दृष्टि से यह तथ्य काफी हद तक सही हो सकता है।

भारतीय परिवार में स्त्री परिवार की धुरी मानी जाती है। स्त्रियां भावनात्मक स्तर पर ज़्यादा संवेदनशील भी होती हैं। उनके इसी गुण का उपयोग समय-समय पर समाज निर्माताओं ने किया। उसकी भावनाओं का दोहन करके जहां समाज को टूटने से बचाने का प्रयास किया गया] वहीं पति] पुत्र] भाई] पिता परिवार के नाम पर उसे मर्यादाओं] श्रृंखलाओं में जकड़कर उसके बौद्धिक विकास को कुंठित किया गया।

इन व्रत-पर्वों के मूल में समाज का आर्थिक पक्ष भी है जो सबसे महत्वपूर्ण है। पितृसत्तात्मक भारतीय समाज में स्त्रियां आर्थिक रूप से पति पर निर्भर रही हैं। अपने खाने] कपड़े व अन्य आवश्यक दूसरी वस्तुओं के लिए भी उन्हें पति का मुहं जोहना पड़ता है। इसलिए भी पति के जीवन से उसके अस्तित्व का प्रश्न जुड़ जाता है। इसलिए अपरोक्ष रूप से अपने अस्तित्व की चिंता में वह पति के अस्तित्व की चिंता करती है।

यही मूल उत्स है उस भावना का जो उन्हें सधवा मृत्यु की कामना से बांधती है और विधवा को हेय दृष्टि से देखने की प्रेरणा देती है। यह ‘अर्थ’ ही है जो उन्हें पति के चारों ओर चकरघिन्नी सा घुमाता है] और पति को क्यों] पुरुष के समस्त रूपों के चारों ओर।

हर रूप में वह हाथ फैलाए है] याचक है। दाता की भूमिका में तो पुरुष ही है। इसलिए ही वह अपने पुरुष का सुरक्षात्मक घेरा मज़बूत करने का असफल प्रयास करती रही है। शिक्षा और बौद्धिक विकास से संपर्क न होने के कारण नियतिवादी होते हुए भी यथार्थ से अपरिचित भारतीय स्त्री ‘करवाचौथ’ सरीखी छलनाओं से स्वयं को बहलाती रही है।

पर आज के युग में जब स्त्रियां शिक्षित हैं] आत्मनिर्भर हैं तब भी इन व्रत-पर्वों की तार्किकता पर बिना कोई विचार किए बस उन्हें निभाए चली जा रही है] यह कहकर कि ‘यह हमारी संस्कृति है।’ आश्चर्य तो तब होता है जब वे यह मानती हैं कि ये निराधार हैं लेकिन इनके क्षणिक आकर्षण से बंधकर इन्हें छोड़ने को तैयार नहीं होतीं और इनकी महानता के गुण गाती हैं।

इस संदर्भ में स्त्री-पुरुषों के मध्य किए गए एक सर्वेक्षण से ज्ञात हुआ कि अधिकांश पुरुष यह जानते ही नहीं कि उनकी पत्नियां यह व्रत क्यों करती हैं\ जो जानते हैं] वे इसे मूर्खता के अतिरिक्त कुछ नहीं बताते। शेष में से कुछ तटस्थ हैं तो कुछ इसके आग्रही। इसके विरोधियों की संख्या न्यूनतम है। स्त्रियों में से अधिकांशतः ऐसी मिलीं जो यह जानती हैं कि यह बिल्कुल तर्कहीन और बेकार है] पर परिवार की बुजुर्ग स्त्रियों के दबाम में रहती हैं। सबसे ज़्यादा मज़े की बात यह है कि ये बुजु़र्ग स्त्रियां भी यह जानती और मानती हैं कि इसका पति की आयु से कोई संबंध नहीं। फिर भी वे इसे करती हैं] करवाती हैं।

इस सदी की विडम्बना ही है कि हम अभी तक संस्कृति के नाम पर बहुत कुछ ऐसा ओढ़े हुए हैं जो संस्कृति नहीं] समय की देन है और हम इसे छोड़ते हुए शायद इसलिए डर रहे हैं कि कहीं अति आधुनिकतावादी न करार दिए जाएं।

इस बात का यह तात्पर्य कदापि नहीं कि स्त्री को सांस्कृतिक मान्यताओं से विलग करने का आग्रह किया जा रहा है। किंतु स्त्री अस्तित्व की सार्थकता और स्थायित्व के साथ हम जिन प्रत्ययों को जोड़े हुए हैं उनका तार्किक व बौद्धिक आधार क्या है] यह प्रश्न भी कुछ कम विचारणीय नहीं है। इसलिए संस्कृति के नाम पर ढोए जाने वाले इन पर्वों को निरंतर अपनी स्वीकृति देते हुए अपने अस्तित्व की खोखली पहचान से अपने को जोड़े रखना अपने स्थायित्व का भ्रम ही है] अन्य कुछ नहीं। भारतीय समाज में करवाचौथ ही नहीं] तीज] वट-सावित्री और ऐसे ही अनेक अन्य पर्व मौजूद हैं] जो स्त्री को उसकी पारंपरिकता से मुक्त कर संपूर्ण विकास की ओर अग्रसर नहीं होने दे रहे हैं।

जब तक स्त्री बूढे़ चंद्रमा और बूढ़े पति की प्राप्ति के प्रत्ययों में फंसी रहेगी] उसके उपग्रह होने के भौगोलिक तथ्य को स्वीकार कर अर्घ्यदान नहीं छोड़ेगी] तब तक उसकी मुक्ति संभव नहीं है। चाहे आप संसद में सौ फीसदी आरक्षण करा लें या नारी मुक्ति संगठन सड़कों पर अनवरत आंदोलन करें। पर ‘करवाचौथी’ संस्कृति से मुक्त हुए बिना स्त्री की कोई पहचान नहीं हो सकती है। 

अनुजा

मंगलवार, 16 मई 2023

रेत समाधि के बहाने...!


पढ़ने की लगन बचपन से थी । साहित्य के क्लासिक्स पढ़े अपने पढ़ने की लगन में, बेपरवाह । प्रेमचंद को ऐसे पढ़ा जैसे बस लहर बहती है। साहित्य के भीतर छिद्रान्वेषण के लिए कभी जगह नहीं पाई । जिस किताब और लेखक ने बांधा, उसे पढ़ते गए । साहित्य की सामयिक गतिविधियों के संपर्क में जब आए तो उस दौर के लेखकों से परिचय बढ़ा । महिला लेखन के दौर में अनेक लेखिकाओं के साथ ही गीतांजलि श्री को पढ़ने की बड़ी ललक रहती थी, पर कभी ऐसा संयोग हो ही नहीं पाया कि उनकी किसी कहानी, उपन्यास या संग्रह को पढ़ पाती । बीच में काफी लंबी लाइन होती थी। इस बरस अंततः गीतांजलि श्री के लेखन से परिचय हो ही गया । जब ‘रेत समाधि’ चर्चा में आई । किसी हिंदी उपन्यास को बुकर पुरस्कार मिला । हिंदी की दुनिया में यह एक बड़ी उपलब्धि थी । हालांकि ‘रेत समाधि’ को पुरस्कार मिलने का माध्यम उसका अंग्रेज़ी अनुवाद ‘टाॅम्ब आॅफ सैंड’ बनी पर अंग्रेज़ी में ही सही, श्रेय तो मूल कृति को ही जाता है। अब एक छटपटाहट बनी कि किसी तरह इस किताब को पढ़ा जाए और अंततः वह किताब हाथ आ ही गई। 

किताब पढ़ने के बाद मन में अनेक प्रश्न उठे, अपनी भाषा और कहन के कलेवर में अद्भुत रचनात्मकता से युक्त इस उपन्यास के साथ अंग्रेजी में कैसे न्याय किया गया होगा, क्योंकि अनुवाद का अपना एक संसार होता है, और हर भाषा की अपनी सीमाएं और शैली । अब रेत समाधि की भाषा, कहन और प्रस्तुतिकरण, जो सामान्य तौर उपन्यासों के शिल्प और शैली में अत्यन्त भिन्न है, अपनी कथा और कहन में वह जितनी सामान्य, असामान्य और चमत्कारिक है क्या अंग्रेज़ी में वैसे ही प्रयोग किए गए, यथावत्? 

क्या एक भाषा से दूसरी भाषा में जाने पर चमत्कार कम हुए, कहन को हूबहू वैसा ही रख पाया गया, या अंग्रेज़ी की शैली के हिसाब से उसे बदल दिया गया ? इस जिज्ञासा ने अनूदित रचना की खोज शुरू करवाई और अंततः वह मिली । टाॅम्ब आॅफ सैंड के कुछ पन्ने गूगल के संसार में मिले, और उन कुछ पन्नों में कहन हिंदी से भिन्न है । भाषा के साथ शैली में बदलाव है। कहानी वहां सीधी और सहज चलती है, कहीं-कहीं, कुछ शब्द ध्वनियों का प्रयोग किया गया है। 

इस किताब को किसी एक भाव, समझ या राय के बिना पढ़ा, सिर्फ पढ़ा, रसहीनता और रसज्ञता के बीच झूलते हुए, पकते और आनंदित होते हुए। कथा और कहन के बीच की यह रस्साकशी अंत तक चलती रहती । यकीनन इसकी पढ़ाई पैसंेजर ट्रेन की गति से हुई, फर्क सिर्फ इतना था कि पैसेंजर ट्रेन को किसी स्टेशन से आगे बढ़ने के लिए पिछले स्टेशन से यात्रा पुनः नहीं शुरू करनी पड़ती है पर ‘रेत समाधि’ के पाठक को यह मशक्कत करनी पड़ती है, अब इसे आप इसकी कमी समझिए या खूबी, यह प्रत्येक पाठक का अपना निजी मत हो सकता है। 

साहित्य में प्रवाह और आनंद को खोजने वालों को ‘रेत समाधि’ थोड़ी उबाऊ लग सकती है पर कथा का सूत्र जैसे ही प्रवाह में आता है, यह बांध भी लेती है। कथानक के बीच में मूर्त अमूर्त और प्रतीकात्मक प्रसंग, जो वहां पर अनावश्यक से प्रतीत होते हैं, कथा के रस-रंग को खत्म करते हैं, जैसे- ‘बड़े’ बेटी के घर पेड़ के रास्ते अम्मा को देखने जाते हैं और वहां कौआ संसार की बातें बीच में आ जाती हैं। कौआ संसार समूह की यह कथा बीच में दखलंदाजी प्रतीत होती है। पाठक की ‘बड़े’ की कोशिशों और प्रतिक्रियाओं को देखने समझने की चेष्टा के बीच में यह प्रसंग पूर्णतः अप्रासंगिक और व्यवधान प्रतीत होता है। कौवे, तीतर और तितलियों के ये प्रतीक कहानी के बीच में जगह-जगह पर बिखरे पड़े हैं। कहीं पर ये बड़े अरुचिकर और अनावश्यक प्रतीत होते हैं पर कहीं कहानी में रुच जाते हैं ।

बौद्धिक साहित्य के वर्ग से आती हुई कई रचनाएं अपनी विशिष्ट शैली और विधा के कारण चर्चित रहती हैं, पसंद की जाती हैं, वे अपनी बौद्धिकता और चमत्कार में बड़ी सहज और ज़मीनी प्रतीत होती हैं, किंतु हाँ, इसके उलट ‘रेत समाधि’ में कई स्थानों पर बौद्धिकता और चमत्कार जबरदस्ती बोया गया लगता है और वो भी किसी विशेष बिंदु को रेखांकित करने की मांग पर नहीं। अन्यथा ‘रेत समाधि’ की पूरी कथा कुछ सर्गों या भागों में बड़े स्पष्ट रूप से बँटी दिखाई देती है। यह एक दुखद दुखांत कथा है जिसे गीतांजलि श्री ने बड़े खिलंदड़े अंदाज़ में आनन्दमय रोचक तरीके से इस तरह प्रस्तुत किया है कि जीवन, समाज, समय और सभ्यता के गहन गंभीर मुद्दे भी बिना किसी अवसाद के पाठक के भीतर उतरते जाते हैं, यह दूसरी बात है कि इसके लिए किताब एक से अधिक बार पढ़ना ज़रूरी है।  

कथा एक 80 बरस की वृद्ध माँ के रूपांतरण की कथा है, जो अपने पति की मृत्यु के बाद अवसाद में है। वही मुख्य किरदार है, जिसकी विरक्ति पुत्र के रिटायरमेंट के बाद के घटनाक्रम में दिखाई देती है और वहाँ से बढ़ती हुई कथा उसके खोने, मिलने और फिर बेटी के घर में रहने तक आती है। यहाँ वह अपने जीवन को अपने मन से जीती दिखाई पड़ती है। धीरे-धीरे खुलती हैं उसके भीतर की शांत पड़ चुकीं इच्छाएं, अपेक्षाएं, रुचियां, सपने और स्मृतियां । भूला बिसरा सब कुछ वह जीना शुरू कर देती है। यह दरवाज़े की ओर पीठ किए ‘नईं नईंईंईंईंईं’ कह अपने में छोटी होती जाती माँ नहीं है। यह अपने विस्तार में फैलती औरत है, जिसके भीतर स्मृतियों, कौशल और जीवन का संसार खुलता है। यहाँ प्रकट होती है रोज़ी, और रोज़ी के साथ ही उसके जीवन की एक दूसरी धारा, दूसरा रूप दिखाई पड़ता है, जो उसके बच्चों की समझ से भी बाहर है । रोज़ी का मरना और माँ बेटी का पाकिस्तान जाकर चिरौंजी देना इस आख्यान का अंतिम अध्याय है जहाँ जाकर यह बात खुलती है कि माँ और रोज़ी बँटवारे के समय एक साथ पाकिस्तान से दो बच्चियों की शक्ल में हिंदुस्तान ढकेल दी गईं। बेटी पर अब खुलता है कि रोज़ी से माँ का इतना प्रेम क्यों है। पाकिस्तान मंे अपने घर, मकान और लोगों से मिलते हुए माँ अपने पुराने प्रेमी या शौहर तक पहुँच जाती प्रतीत होती है, शुरू से दबी-ढकी कथा यहाँ आकर खुलती है कि यह विभाजन और किशोरवय में बिछुड़े अपनों की पीड़ा, और रेगिस्तान में भागती बचती दो बच्चियों के संघर्षों की सो गई स्मृतियों के दुःखों से बुने वो धागे हैं जो अब तक सुलझाए नहीं गए । कथा को इस विकास तक लाने के लिए तमाम घटनाएं, प्रसंग और प्रहसन रचे गए हैं।

जीवन इतना छोटा और संक्षिप्त नहीं है कि इसी से शुरू और खत्म हो जाए, वह अपने विकास में विस्तृत हुआ और बच्ची चंदा ‘चंद्रप्रभा देवी’ होती है, एक भरे पूरे परिवार की मुखिया जो उम्र के इस पड़ाव पर आकर छोटी होती जाती है। यह छोटे होते जाना, सिमटते जाना दरअसल अंतर में स्मृतियों के विस्तार का संकेत है, जो सामान्य सामाजिक जीवन जीने वाली परंपराओं को समझ नहीं आता है। यही स्मृतियाँ वो तितलियाँ हैं जो, उसकी छड़ी के खोलने बंद होने पर उड़ती रुकती हैं। छड़ी ही शायद वह सहारा है, जो उसे हौसला देती है, वापस यात्रा करने की। इस आदि-अंत की पूरी गाथा के बीच में पारिवारिक सदस्यों, उनके जीवन और रोज़मर्रा की घटनाओं को तरतीबवार बँधी हैं । रिटायर बेटे की तरतीबवार, और अविवाहित बेटी की बेतरतीब बोहेमियन ज़िंदगी से उनकी नागवारी की कथा। इसके बीच में गुँथे दिलचस्प संवाद, माँ के आड़े तिरछे जवाब कथा को रोचकता से बुनते हैं। एक पूरा जीवन, जिसमें कई जीवन और यादें गुंथी हैं, प्रसंग और प्रवाह के साथ उपन्यास का विकास करते हैं। किंतु पात्रों और घटनाओं की इस बुनन के मध्य अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनैतिक बिंदु भी हैं । मसलन, परिवारों में चलने वाली राजनीति, बहू का दीनता प्रदर्शन और बेटी की आलोचना । ‘बड़े’ की बहन से नाखुशी और अलगाव । मां को अपने ही पास रखने की अबोध दंभी ज़िद और बेटी के पास मां के रहने की अस्वीकार्यता, बेटी के अपनी चयनित स्वतंत्र जीवन-शैली पर मंथन करता मन, ये केवल पारिवारिक मतभेदों, असुरक्षाओं को ही नहीं दर्शाते, हमारी पूरी सामाजिक सरंचना, सोच और मनोविज्ञान को भी खोलकर सामने रख देते हैं। वहीं दूसरी तरफ समाज, परिवार में स्त्री की भूमिका, उसके स्थान और छवि के बारे में बताते हैं। स्त्री केवल साधारण तौर पर मनुष्य नहीं है, विभिन्न भूमिकाओं और चरित्रों में उसकी पहचान अलग है और उसी के अनुसार उससे व्यवहार। यहां परिवार या रिश्तों की मर्यादा भी उसे नहीं बख्शती । 

दूसरी तरफ माँ के किरदार को देखें, तो ‘बड़े’ के घर में दरवाज़े को पीठ दिखाए अपनी स्मृतियों के साथ जीती वृद्धा, बेटी के घर जाते ही एक मुक्ति का उत्सव बन जाती है। माँ के किरदार का यह रूपांतरण वह बोलता है जो कहानी में सीधे-सीधे नहीं कहा गया है, यदि पाठक सुनना चाहे तो । रोज़ी के किरदार की रचना और माँ से उसका बहनापा वास्तव में घरों में, परिवारों में, समाज में किन्नरों की एक भिन्न छवि और भूमिका को गढ़ता है, उनके स्वीकार्य को सहज करता है। कहीं एक संदेश भी है इसमें कि संघर्ष और दुःख का साथ लैंगिक भेदभाव से कमज़ोर नहीं पड़ता, बल्कि समय के साथ गहरा होता जाता है, भले ही बीच में कितनी ही लंबे फासले हों। रोज़ी की मृत्यु किन्नर समाज के अकेलेपन और चुनौतियों को दर्शाती है। ऐसे बहुत से छोटे बिंदु हैं, जो ऐसे बहुत से मुद्दों पर बात करते चलते हैं । कथा का चरम विकास माँ का बाॅर्डर पार कर पाकिस्तान जाना, खैबर में कैद होना, और कै़द में कुछ इस तरह निश्चिन्त होना, मानो उसका अपना ही घर हो। हाँ, अपना ही तो घर था, जहां से विभाजन के समय बेदखल हो देश के दूसरे हिस्से में आ गई थी, पीछे छूट गया था कितना कुछ। बेशक यह कथा काल्पनिक हो सकती है पर ये अब  भी जीवित बहुत से वृद्धों की कथा हो सकती है। विभाजन के समय की दुश्वारियां, दुःख, संघर्ष और अपनी ही मिट्टी में विदा कहना, अस्सी बरस तक का जीवन जीने वाली किसी वृद्धा के भीतर की एक कितनी गहन कौंध हो सकती है, इसे समझना, बूझना और महसूस करने-कराने में समर्थ है कथा।

हालांकि इस कथा के कहन को पहचानने की चेष्टा करती हूँ तो कहानी सुनने-सुनाने की कोई धुंधली सी याद जे़हन में रह-रहकर उभरती है, पढ़ने की नहीं । कई बार जो एक बात मन में कौंधती है कि तमाम अनावश्यक से लगते प्रसंग और प्रहसन, जो कथा के बीच में एक संदर्भ प्र्रसंग से परे चले जाते प्रतीत होते हैं, वे, और कथा की कहन, वे लोक की कहन से प्रेरित प्रतीत होते हैं । एक कहानी के भीतर गंुथी हुई है दूसरी कथा । गांव की  चैपालों पर गढ़ी और कही जाने वाली कथाएं, जो किसी मस्त कथावाचक या किसी गांव के किसी यायावर गड़रिये, जिसके पास अनगिनत घरों और लोगों की कहानियों का जमावड़ा होता है, जिसके कहने का अंदाज़ बिल्कुल जुदा होता है, ऐसा कि हर कोई कहानी सुनने को बैठ जाए, जिनमें कहानी के सिरे तमाम अप्रासंगिक प्रसंगों और प्रहसनों के बावजूद अपने प्रवाह में बहते रहते हैं, रेत समाधि की कथा-कहन उन कथाओं को कहने वालों के अंदाज से भी प्रेरित प्रतीत होती है।

कई बार ऐसा लगता है कि बचपन में किसी मेले में किसी कथा की कहन के आनंद का कोई सूत्र मन-मस्तिष्क में छूट गया, मन उसे बुनता गढ़ता रहा और किसी कल्पित और सत्य कथाओं के बीच के किसी कथानक को बुनने के समय में वही शैली और कहन रुचिकर कलात्मक तरीके से कलम में उतर आई। इस भाषा और कहन में पूरी कथा को अभिव्यक्त करने के लिए अपार धैर्य और मशक्कत की जो ज़रूरत थी, वह भी पाठक को महसूस होता है, जब वह इसे पढ़ता है जिसका बिंदु नाद कहीं भीतर सदियों तक शायद लेखिका के भीतर गुनगुनाता रहा होगा, और पढ़ने के बाद पाठक के भीतर भी गुनगुनाता रहेगा। 

यह सिर्फ मेरी कल्पना और अनुमान है, जो इस कथा को पढ़ते हुए मेरे भीतर पके हैं, और यह ही शायद इस पुस्तक की सफलता है कि पाठक के सोचने और समझने के लिए इसमें कई सूत्र हैं। इस कथा में कहन के भिन्न, अनूठे व ज़मीनी प्रयोग हैं। ये प्रयोग कहीं तो बड़े रोचक लगते हैं और कहीं कथा कहन में बाधक भी महसूस होते हैं, जब दोबारा पन्ना खोलने पर पुराने सूत्र को समझने के लिए पलट-पलटकर पीछे जाने की कवायद करनी पड़ती है। हालांकि ये प्रयोग इस पुस्तक को कहीं नवीन बनाता भी है और कहीं सामान्य पाठक के हाथ से सरका भी देता है। यह कहन और भाषा सहज और रौ में नहीं, सप्रयास लिखी गई प्रतीत होती है। 

कुल मिलाकर ‘रेत समाधि’ एक ऐसा उपन्यास है जिसे एक बार हर हाथ से गुज़रना तो चाहिए ही, कहन की कठिनता और उलझाव से भरा किंतु यह एक रुचिकर उपन्यास है। कथा का सिरा धीरे धीरे और एकदम अंत में खुलता है । जिज्ञासा अंत तक बनी रहती है कि क्या नायिका मां पाकिस्तान से सदेह सजीव वापस आ सकेगी या नहीं । पर जिस नाटकीय तरीके से उसका अंत दिखाया गया है वह भी चमत्कृत करता है। कथ्य में भी एक बात और चमत्कृत करती है, और गंभीर और तार्किक पाठक के मन में प्रश्न उठाती है, उठाएगी कि जो बेटी एक पत्रकार है और पुत्र इतना प्रभावी सरकारी अधिकारी रह चुका है वह किस तरह से मां के इस गैरज़िम्मेदाराना व्यवहार पर राज़ी हो जाता है और पीछे के दरवाज़े से इस विवादास्पद देश में जाने के लिए साथ चल पड़ता है, क्योंकि वास्तविकता में सरहदों की लाइन आॅफ कंट्रोल इस तरह पार तो नहीं की जाती, भले ही कथा तमाम सरहदों की सीमाओं से परे व्यापक होते-होते संपूर्ण संसार में फैल चुकी हो । फिर भी पैसेंजर ट्रेन की गति से पहली बार पढ़े जाने वाले इस उपन्यास में बाद में धीरे धीरे कोनों अतरों में झांकने, और उन प्रसंगों को चुभलाते रहने का आनंद देने की पर्याप्त क्षमता है। 

अनुजा

(उत्तर प्रदेश त्रैमासिकी में प्रकाशित)

शनिवार, 6 मई 2023

किताब की उम्र पिरामिड से ज़्यादा होती है- नूर ज़हीर

पिछले दिनों ‘लखनऊ एक्सप्रेशंस’ के आयोजन में नूर ज़हीर का कथा पाठ था। अपनी नई किताब अपना ख़ुदा एक औरत: My God is a women के कुछ हिस्सों का उन्होंने इस कार्यक्रम में पाठ किया। इस स्वलिखित किताब का अनुवाद नूर ने ही किया है। नूर हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों ही भाषााओं में लिखती हैं।

अगले दिन बांग्ला देश के शाहबाग आंदोलन पर बात करने के लिए वो एक कार्यक्रम में शिरकत कर रही थीं! लखनऊ की नूर तीन दिनों तक अपने शहर के साथ अपने शहर वालों के साथ थीं। इस दरम्यान उनसे एक मुलाक़ात, जीवन समाज और समय के बहुत सारे पक्षों पर उनसे बातचीत का मौका मिला। यहां प्रस्तुत है उस लंबी बातचीत के संपादित अंश:  

प्रसिद्ध उर्दू लेखक, मार्क्सवादी चिंतक व इंकलाबी सज़्ज़ाद ज़हीर और रजिया ज़हीर की चार बेटियों में सबसे छोटी बेटी हैं नूर ज़हीर। शोधार्थी, नृत्यांगना, एक्टिविस्ट और लेखक...एक साथ चार भूमिकाओं को जीती हैं नूर। दस वर्ष (1979-89) अंग्रेज़ी पत्रकारिता में गुज़ारे और इस बीच नेशनल हेराल्ड, पैट्रियट और टेक।। तथा प्वाइंट काउंटर प्वाइंट में काम करती रहीं। कथक नृत्य की प्रवीण नृत्यांगना के तौर पर भारत के अनेक स्थानों के अलावा रूस, उजबेकिस्तान, क्यूबा, सिंगापुर और इंडोनेशिया में अपनी कला का प्रदर्शन किया। एक वर्ष तक टाइम्स फेलो और तीन वर्ष तक भारत सरकार के संस्कृति विभाग की सीनियर फेलो रहीं। गए ग्यारह बरस से हिमाचल प्रदेश के किन्नौर और लाहौल स्पीती ज़िलों के आदिवासियों के बीच उनकी मौखिक परंपराओं, नृत्य, संगीत और नाट्य रूपों का दस्तावेजीकरण कर रही हैं। उनकी रचनाओं में चार लंबे नाटक- नयन भरी तलैया, काहे का, पत्थर के सैनिक, मानस हिरण और चैबीस अन्य बाल नाटक हैं। बर्तोल्त बे्रख़्त  के विज़न्स आॅव दि सन जैसे नाटकों का अनुवाद भी इसमें शामिल है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के लिए शेक्सपियर के ‘टाइटस एंद्रोनिकस’ और ज्यां आनूह के ‘आर्देल’ का भी हिन्दी अनुवाद नूर ज़हीर ने किया है।

नूर का बचपन लखनऊ में गुज़रा और बहुत बेहतरीन गुज़रा अपने बचपन को याद करते हुए वो कहती हैं, ‘‘बचपन मेरा बहुत ही खुशगवार गुज़रा। अगर कोई मुझसे पूछे कि दोबारा अगर आपको बचपन मिले तो कैसा जीना चाहेंगी तो मैं कहूंगी, वैसा ही बचपन मिले जैसा मिला...! 

लखनऊ का फैला हुआ घर, ....उसमें बड़े लेखक जो घर पर आते रहते थे...सहज भाव से बैठते थे, हमारे साथ बातें करते रहते थे, और सिर्फ उर्दू के लेखक नहीं.... हमने अपने घर में मलयालम के लेखक भी देखे, फ्रेंच के भी देखे, रूसी भी आते थे, उर्दू के लोग भी रहते थे, हिन्दी भी, कश्मीर से आते थे! ये आज के दौर की चीज़ है कि उर्दू हिन्दी अलग है हिन्दी, बंगाली अलग है। उस वक्त ये था कि प्रगतिशील आंदोलन मे सभी लेखक थे और सिर्फ वो लोग लेखन की बात नहीं करते थे, पाॅलिटिक्स, महिलाओं के मुद्दे, दलितों के मुद्दे, किस चीज़ तवज्जो दी जानी चाहिए, किस चीज़ पर कम कर देनी चाहिए, क्या चीजें उठानी चाहिए, इक्नाॅमिक्स क्या है, ग्लोबलाइज़ेशन क्या है ।  आज जो हम देखते हैं कि लेखन में बहुत कम हो गया है। लेखन लोग यही कर रहे हैं कि बस मैं और मेरी ज़िन्दगी, मेरी सोचना, मेरी मोहब्बत मेरा इश्क...वो नहीं था इसलिए वो बचपन बहुत अच्छा था, बहुत खुशगवार था!’’

ये कौन सा दौर था समय के हिसाब से....?

मेरी पैदाइश सन् 58 की है और मेरी यादें 63-64 से मानी जा सकती हंै। वो एक बनती हुई दुनिया की कहानी थी। हिन्दुस्तानियत, भारतीयता वो पूरी हर बात में जिंदा थी और भारतीयता का बहुत बड़ा अंश था सेक्युलरिज़्म। बचपन में घुट्टी में डाल दिया गया था कि इंसान को इंसान की तरह परखोगे। कभी किसी मोड़ पर ये नहीं सोचोगे कि अरे इसने मेरे साथ दुव्र्यवहार इसलिए किया कि मैं मुसलमान हूं या ये तो ऐसा करेंगे ही क्योंकि ये मुसलमान हैं या ये ठाकुर हैं...इस तरीके की चीजें नहीं सोचनी हैं। और उसको लेकर बराबर लड़ाई होती रहती थी।

अभी के माहौल में जो हम ये देख रहे हैं, बहुत ज्यादा हिंसा और विभाजन और वो भी छोटे छोटे मसाइल को लेकर, और उसे फिर सांप्रदायिकता का रूप दे दिया जाता है, उसकी क्या वज़ह लगती है उन्हें?

अहम मुद्दे घटा दिए गए हैं समाज से, और इसकी कोई वजह नहीं है....ये एक सोची समझी साजिश है पूरे समाज को अपने जरूरी मुद्दों से हटा देने की। इस तरह उलझाया गया है समाज को धर्म में....., और मैं सारे धर्मों की बात कर रही हूं....। ये केवल अलगाव तक नहीं, बल्कि मैं तो ये भी देखती हूं कि छोटी छोटी पूजा और नज़र नियाज़ देने में कितना आडम्बर हो गया है आज....! पहले ये होता था कि अपने घर में छोटी सी पूजा कर ली कि त्यौहार है। और उसके बाद बाहर जाकर सबके साथ मिल कर खाया पिया....। अब उसका इतना ज्यादा आडम्बर हो गया है। 

नूर साहित्य, आंदोलन की दुनिया से जुड़ी रही हैं। 

उस दौर में जब वो बड़ी हो रही थीं तो क्या कोई लक्ष्य बनाया था जीवन का? 

हां, तब तो यह था कि वामपंथी आंदोलन से जुड़े थे तो तब तो यह लगता था कि दुनिया को बदलने में लगा देनी है पूरी ज़िन्दगी पर फिर जब और बड़े हुए तो यह लगा कि पूरे हिन्दुस्तान को तो शायद नहीं बदल सकते, लेकिन ये ज़रूर था जो चीज क़ायम रही, जो सिखाया गया था बचपन से और हमने शायद माना था कि लेखन के ज़रिये समाज को सोचना सिखाया जा सकता है और अगर सोचना सिखाया जा सकता है तो सोचते सोचते वह उन नतीजों पर ज़रूर पहुंचेगा और वह फिर अपना बदलाव खुद करना शुरू करेगा और सवाल उठाना शुरू करेगा।

तब से, उम्र के उस दौर से आज क्या फर्क पाती हैं ?

देखिए समाज को बदलने की जरूरत तो हमेशा रहेगी और समाज को बदलना एक मुस्तक़िल सिलसिला है। यू.एस.एस.आर. या लेफ्ट सोशलिस्ट ब्लाॅक के गिरने की वजह यही थी कि उन्होंने समाज को बदलना बंद कर दिया था कि जितना बदलाव हो गया है वह हमारे लिए काफी है, और इसके आगे बदलाव की जरूरत नहीं है। जबकि समाज का बदलना एक साइकिल है, वो हमेशा चलते रहना चाहिए, उसकी कोशिश हमेशा रहनी चाहिए, सवाल हमेशा समाज पर उठने चाहिए और जवाब हमेशा हासिल करने की कोशिश करते रहना चाहिए। 

जहां तक लेखन का सवाल है, तो तब लोग लेखन पर रिएक्ट करते थे, अच्छा और बुरा दोनों ही। आज मेरे ख्याल से रिएक्शन कम हुआ है और उसको भी मैं ग्लोबलाइजेशन से जोड़ूंगी...एक अंगे्रज़ियत का दौर आ गया है। मैं अपने को हिन्दी और अंगे्रजी दोनों का लेखक मानते हुए कहूंगी कि जब यह फैसला लिया था कि अब हिन्दी/देवनागरी में लिखूंगी तो यह मानते हुए लिया लिया था कि हिन्दी ज़्यादा पढ़ी जाती है लेकिन आज मैं देखती हूं कि ज्यादा तवज्जो अंग्रेजी की तरफ है जो सिर्फ मेरे लिए नहीं पूरे मुल्क के लिए चिंता का विषय है। 

लेखन जिनके बारे में और जिनके लिए किया जा रहा है, उनके पास उसे पढ़ना, लिखना सोचना, इसके लिए कोई समय नहीं है तो ऐसे में लेखन कहां पर, कितना और क्या बदलाव कर पाएगा? या फिर आपको लगता है कि एक खास समूह में बदलाव कर देगा और फिर बाकी के साथ फिर काम करने की जरूरत पड़ेगी।

दोनों ही बातें हैं। पहली बात तो यह कि मैं यह नहीं समझती कि लेखन जो है वो उसी वक़्त तक सीमित रहता है। किताब की उम्र पिरामिड से ज्यादा है। एक किताब आप लिख देते हैं तो उसका असर बहुत दूर तक जाता है और इसीलिए लिखना जो है वो सिर्फ उसी दौर तक सीमित नहीं रहता। जहां तक रही निजी फौरी बदलाव की बात तो जरूर काम करने की जरूरत है और इसमें मैं समझती हूं कि लेखक कहीं अलग नहीं है, वह समाज का ही हिस्सा है और जरूरी है कि वह समाज से ही जुड़ा रहे। आज के दौर की मुश्किल यह है कि हमने किसान के बारे में, मजदूर के बारे में, गांव में जो औरत है, जो औरत रेड लाइट एरिया में है, जो कस्बों में हैं उनके बारे में जानकारी रखनी कम कर दी है। जो ताकत प्रेमचंद की क़लम में थी वो हमारे क़लम में इसलिए कम हो गयी है क्योंकि हम ये सब जानकारियां नहीं रखते। हममें से कितने लोग जानते हैं कि कर्नाटक में जो किसान आत्महत्या कर रहे हैं वो किन वजहों से कर रहे हैं। उस कपास में ऐसा क्या है, किस तरह से फर्टिलाइजर्स पर से सब्सिडी हटाई जा रही है, किस तरह से सिंचाई के साधन नहीं हैं, किस तरह से बैंक लोन दिया जा रहा है और किस तरह से बैंक्स जो हैं, वो गुंडे पाल रहे हैं कि जाओ जाकर वसूली करो जाकर।

तो किस तरह से हमें सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक स्तरों को बदलना चाहिए कि समाज का कल्याण किया जा सके?

देखिए, पहले तो मुझे इन शब्दों से एतराज है कि समाज का कल्याण करना चाहते हैं। समाज में जो बदलाव है वो भीतर से आता है। ज़ेहनी और दिमाग़ी तैयारी में जरूर आप सहयोग दे सकते हैं। जो कल्याण की बात है वो ऊपर से थोपी गयी चीज़ होती है और वो कभी भी ग्रास रूट लेवल तक नहीं पहुंचती और वो स्थायी और सतत् भी नहीं होती। मुझे लगता है कि शुरू से किसान को ठगने की नीति के साथ ही बैंक्स आ रहे हैं या उसको आप ग्लोबलाइजे़शन कह लें या वेस्टर्न नीति कह लें या पूंजीवाद कह लें, वो अलग अलग नाम हैं पर उसका मुद्दा एक ही है। जो सदियों से चीजें हो रही हैं उसी का एक तरह से पैकेजिंग और कवर बदल गया है। 

हमारे यहां जो नीति बनाने वाले लोग हैं वो लोग बिक गए हैं। इस ज़मीन के जो किसान हैं, मज़दूर हैं, खेत मज़दूर हैं, फैक्ट्री वर्कर्स हैं उनके बारे में बिल्कुल नहीं सोच रहे हैं। इतना बड़ा करके सार्क जमघट बनाया गया है आठ मुल्कों का और ये पाॅपुलेशन का सबसे डेंस एरिया है सारी दुनिया में, यहां पर स्किल्ड और अनस्किल्ड वर्कर सबसे ज्यादा मौजूद है। मल्टीनेशनल्स यहां आएंगी ही, यह मान कर चलना चाहिए और हमारे जो पूंजीपति हैं वो भी फैलेंगे, बड़े होंगे। हर दूसरे साल सार्क सम्मिट होता है, हमारी सरकारें कभी ये बात नहीं करतीं कि हमारा लेबर कैसे प्रोटेक्टेड होगा! हमारे कांट्रैक्ट लेबर को क्या वेज दी जाएगी! क्यों नहीें ये आठ मुल्क बैठकर ये तय करते हैं कि नहीं भई, मिनिमम वेज तो इतना होगा, यही इंडिया में इतना है, पाकिस्तान मंे इतना हो जाएगा, नेपाल में इतना, बांग्ला देश में इतना टका हो जाएगा, अफगानिस्तान और श्री लंका में इतना हो जाएगा। क्यों नहीं हम तय करते हैं क्योंकि हमारे नीति बनाने वालों की दिलचस्पी ही नहीं है कि लेबर को प्रोटेक्ट करें। 

ये जो हमारे समय में इतनी हिंसा और यौन हिंसा बढ़ गयी है, इसकी वजहें क्या हैं, इसकी सज़ा क्या हो और इसे रोका कैसे जाए?

सज़ा तो किसी एक घटना से जुड़ी हुई होती है लेकिन समाज की सोच को बदलना मुस्तक़िल प्रक्रिया है, उस पर काम लगातार होते रहना चाहिए। जहां तक महिलाओं के खिलाफ़ हिंसा का सवाल है उसमें मैं केवल रेप को नहीं गिनूंगी, उसमें मैं डोमेस्टिक वाॅयलेंस को भी गिनूंगी, मैं ट्रिपल तलाक़ को भी गिनूंगी, मैं मेहर न देना, बच्चों की मेंटीनेंस न देना, उसको भी गिनूंगी, उसमें जो तेज़ी आयी है उसकी वजह यही है कि पेट्रियार्की अपने आखिरी चरम में है। 

मुुंबई की इस लड़की को तो मेरा जी चाहता है, मैं गले लगा लूं, बहुत बहादुर लड़की है ! वो एक मिसाल है अपने आप में और एक तमाचा है पेट्रियार्की के मुहं पे कि देखो जैसा तुम समझ रहे हो कि हम मुहं छिपाते फिरेंगे, हम मुहं छिपाते नहीं फिरेंगे।

क्या वजह है कि सरकार एक पाॅलिसी बनाती है महिलाओं को लेकर ,मगर ग्राउन्ड पर जाकर वो वैसे लागू नहीं होती है ?

जाहिर है। क्योंकि वो लोग पेट्रियार्कल हंै। उनकी अपनी जो छोटी सी सत्ता है वो ग्राम प्रधान क्यों छोड़ेगा ? अब जहां पर रिजर्वेशन कर दिया गया है कि महिलाएं ग्राम प्रधान होंगी, वो शिफ्ट होता रहता है वहां पर अब एक नया नाम निकल आया है-प्रधान पति। वही आता है वही साइन करता है, बैठता है बीडीओ के आॅफिस में। बीडीओ से मैंनेे पूछा तो वह कहता है- ये तो चलता है मैडम। और ये प्रेशर नहीं मौकापरस्ती है।

इस्लाम व अन्य दूसरे धर्मों से बौद्ध धर्म की परंपराओं और विचारधाराओं में क्या फर्क पाती हैं आप?

बौद्ध धर्म ग्रन्थ मैंने जितने पढ़े हैं उससे मैं इस नतीजे पर पहुंची हूं कि बुद्धिज़्म आपको पूरी तरह आज़ाद छोड़ देता है। एक जगह पर तो बुद्धिज़्म कहता है कि आप ही बुद्ध हो। तो आपको अपना रस्ता खुद तलाश करना है जैसे बुद्ध ने किया और अंत में जब बौद्धगया में उनको ज्ञान प्राप्त हुआ उसमें उनको यह समझ में आया कि अपनी ज़िन्दगी इसी तरह से जीना है, इसके आगे कुछ नहीं है, इसके पहले कुछ नहीं है। इसी में से सब कुछ मिलता है, इसी में से सब कुछ खो जाता है। आज जो बुद्धिज़्म इतना पापुलर हुआ है, उसमें से ज्यादा वजह यही है कि वो आपको आपके ऊपर छोड़ता है। 

लेकिन हाल ही में मैंने फिर से वेद पढ़े और मैं समझती हूं काफी हद तक ऋग्वेद और युजर्वेद में भी ये आज़ादी है। वहां भी ये सवाल उठाया जाता है कि क्या कोई है जो मेरी प्रार्थना सुन रहा है या कोई है ही नहीं, मैं ख्ुाद से प्रे कर रहा/रही हूं। तो ये जो फ्रीडम है सोच का, ये वेदों में भी है। दो वेद में तो है ही। सामवेद तो ज्यादा संगीत की ओर है।  और ये फ्रीडम आपको सूफीज़्म में भी मिलेगी। जो अनल हक़ का काॅन्सेप्ट है, आई एम द ट्रुथ! तो वह यह है कि अपने अंदर आप तलाश कीजिए कि सच क्या है... अब ये आपके ऊपर है कि कितना अंदर आप जा पाते हैं।

कथक को लेकर, जो उनकी परम्पराएं थी उससे अलग जो प्रयोग किए उन्होंने, वो क्या हैं ?

दो तरीके के प्रयोग हुए। एक तो जो पारम्परिक पात्र थे, उनमें भी जो अलग चीजें थीं, मैं जिस तरह से कंसीव करती हूं कृष्ण को, वो बहुत बड़े पाॅलिटीशियन हैं, बहुत बड़े योद्धा हैं, बहुत अच्छे दोस्त हैं। मैं चाहती थी कि वो सारे इंटरप्रिटेशंस, उन कैरेक्टर्स के बारे में, मेरे डांस में आएं, और मैंने वो प्रयोग किए। 

जैसे निराला की राम की शक्ति पूजा, उसको यह माना गया कि ये तो वो राम का ट्रेडीशनल इंटरप्रिटेशन नहीं है। ये तो राम दुखी भी हैं, तड़प भी रहे हैं सीता के लिए। तो उसको लेकर मैंने जहां जहां किया, बहुत अच्छा रिस्पांस रहा, उसको बहुत पसन्द किया गया। 

दूसरी चीज़ ये कि जो नए मुद्दे हैं, आज़ादी का मुद्दा है, इंकलाब का मुद्दा है, औरत की आज़ादी का मुद्दा है, बराबरी का मुद्दा है, उस पर भी जो लिखा जा रहा है उसको भी कथक में नज़र आना ज़रूरी है। उसको भी किया है और वास्तव में अनबन जो शुरू हुई कि ये कथक नहीं है, वो इसी पर हुआ है कि आप औरत की आज़ादी को कथक में कैसे उठा सकती हैं! मेरे लिए राधा बहुत एक आज़ाद औरत है। मियां भी हैं उनके कहीं न कहीं एक पर वो न मियां की बात सुनती है न सास की, उनको इश्क़ है कहीं एक बाहर...। ये इंटरप्रिटेशंस लोग नहीं लेना चाहते, नहीं बात करना चाहते जबकि ये तो हमारे हर मंदिर में मौजूद हैं, उनकी पूजा की जा रही है। तो ये हमारे कल्चर की जो ताक़तें हैं, उसको छोड़ दे रहे हैं, क्यों छोड़ रहे हैं! आई थिंक वी शुड एक्सेप्ट गाॅड लाइक वन आॅफ अस !

अपना ख़ुदा एक औरत , इसकी मूल प्रेरणा कहां पर है और इसका संदेश क्या है ?

शुरूआत तो वहां से हुई जहां से शाहबानो का केस पढ़ना शुरू किया। मैं पेट्रियट में नौकरी कर रही थी और दानियल लतीफी के यहां जाना शुरू किया, वहां बैठना शुरू किया और उनसे बातें शुरू कीं। वहां से ये लगा कि ये औरत तो लड़ाई सच की लड़ रही है, हक़ की लड़ रही है, इसको हक़ मिलना चाहिए। फिर फैसला आया, जो कि उसके हक़ में गया और फिर उस फैसले को उल्टा गया। 

वो बहुत बड़ा सेटबैक था, मेरे अपने सोचने के लिए भी, जो मुझे लग रहा था कि डेमोक्रेसी में लगता था, सब कुछ ठीक हो जाएगा। और मैंने दानियल लतीफी को भी बहुत बुरी तरीके से टूटते हुए देखा, जो कि इतने स्ट्रांग थे, लेफ्टिस्ट थे, औरतों के लिए खड़े होने वाले थे।  जिस दिन फैसला आया हक़ में, इतने खुश थे, कह रहे थे कि अब तो तैयारी करो अब तो बड़े बड़े बदलाव होंगे इस्लामिक लाॅ में। और वही जब फैसला उलट गया तो न रोए न हंसे, बस चुप....घंटों दीवार देखते रहते थे। तो ये जो उनका टूटना था इसने भी मुतासिर किया। फिर जो सीपीआई, सीपीएम, लेफ््ट आॅरगेनाइजेशन जितनी हैं, उनमें जाकर सबसे बात की कि आप लोग क्यों नहीं इसे फैलाते गांव गांव जाकर। तो उनका जो रवैया था कि नहीं मुसलमान ही बदलेंगे, हम अगर कहंेगे तो हमें हिन्दू कहा जाएगा, उसने बहुत डिसार्टन किया, तब लगा कि इस पर और काम करना चाहिए। थोड़ा सा और रिसर्च वर्क किया। 

फिर जो रिफारमिस्ट मूवमेंट था 1940 से, शुरू तो पहले हो गया था लेकिन 1940 में वो नीचे आना, ट्रिपल डाउन होना शुरू हो गया था। तो रिफारमिस्ट मूवमेंट जिस तरह से खत्म हुआ शाहबानो के बाद, वो पूरा पढ़ा, और वहीं से लगा कि इस पर एक किताब होनी चाहिए जो उन मूवमेंट्स से भी कनेक्ट करे और शाहबानो से कैसे खत्म हुआ वो मूवमेंट, उस पर भी बात हो और आगे फिर किस तरह की तब्दीली औरत चाहती, उस पर भी औरत होने के नाते मैं बात कर सकूं।

तस्लीमा का निष्कासन और सुष्मिता का मर्डर...क्या कहेंगी इस पर....?

तस्लीमा के साथ जो भी हो रहा है वो बंगाल गवर्नमेंट ने किया हो या हिन्दुस्तान की पूरी गवर्नमेंट ने, वह बहुत ग़लत है। किसी जगह वो औरत इस मुल्क के खि़लाफ बात नहीं कर रही वो सिर्फ शरीयत के खि़लाफ बात कर रही है जिसके खि़लाफ बात करने की बहुत सख़्त ज़रूरत है। वो ओपेनली बात करती है। जब फै़ज़ को निकाल दिया गया था पाकिस्तान से, जिया उल हक़ की रिजीम में, तब हिन्दुस्तान की पांच युनिवर्सिटीज़ ने उनको जाॅब आॅफर की थी। लेकिन वही फैसिलिटी हम तसलीमा को नहीं हम लोग दे रहे। ये अपने आप में हमारा एक पेट्रियार्कल एटीट्यूड है। 

सुष्मिता का जो ख़ून है वो मुझे पूरा किस्सा समझ में नहीं आया। जिस वक़्त वो शादी करके गयीं और फिर वहां से निकल कर आयीं। उनकी वो किताब आयी- काबुलीवाला की बंगाली बीवी, उस वक्त उनके लिए मेरे दिल में बहुत सिम्पैथी थी। जब इतनी दुश्वारी, इतनी डोमेस्टिक वायलेंस से वो गुज़री थीं तो क्यों नहीं तलाक ले लिया, दोबारा क्यों वह चली गयीं। 

ये मुझे जो औरत जो खुद पशोपेश में रह जाती है और निकल नहीं पाती, इस पर मुझे थोड़ा सा गुस्सा भी आता है औरतों पे और ये लगता है कि भई आपकी ज़िन्दगी सिर्फ मियां पर तो मयस्सर नहीं है, आप तो और भी चीजें करना चाहती हैं तो आगे बढ़िए करिए। 

बचपन की कोई एक कहानी, कोई एक बात जो कभी आप नहीं भूल सकती हैं। 

बचपन की एक बात जो मुझे हमेशा याद रहती है और जिसे मैं बार बार सुनाती भी हूं और जिस पर लोग अक्सर ऐतराज करते हैं कि नहीं सुनाना चाहिए। मैं कोई दसेक साल की थी, जहां से मैं गिनती हूं कि मेरी नास्तिकता की शुरूआत हुई, वो पूरा किस्सा तो मेरे हिस्से की रौशनाई में दर्ज हैं, लेकिन वो अब्बा का एक रूबाई सुनाना था- ‘ऐ बन्दा-ए-हक़ बात को मेरी पहचान। इन्सान एक हक़ीकत है और अल्लाह गुमान।।’

तो ये जो डाउट उन्होंने उस वक्त सिखाया कि हर चीज़ पर सवाल उठाओ और यह अब्बा ने बहुत ही खूबसूरती से किया कि सबसे बड़ी हस्ती जो मानी जाती है आपकी ज़िन्दगी में, भगवान या अल्लाह, उस पर सवाल उठाओ और बाकी जो दूसरी चीजंे हैं वो छोटी चीजें हैं, उन पर फिर सवाल उठाती रहो, तो यह सिलसिला वहां से शुरू हुआ कि सवाल हर चीज़ पर उठाना है.... तो वह सिलसिला अगर मैं जारी रख सकूं तो मेरी खुशकिस्मती होगी। 

ज़िन्दगी को कैसे देखती हैं?

डिस्कवरी।

प्रकृति में क्या पसंद करती हैं ?

चिड़ियों को। सबसे ज्यादा गाती हैं वो, सबसे ज्यादा अच्छी लगती हैं।

कोई ऐसी चीज़ जो लग रही है कि अभी भी छूटी पड़ी है, करना चाहेंगी?

छूटी पड़ी हुई मगर कर नहीं पाएंगे, ये मुझे पता है। मुझे बहुत बहुत गाना गाने का शौक़ है और मैं बहुत बेसुरी हूं। 

जब बहुत परेशान होती हैं तो क्या करती हैं?

पढ़ते हैं। 

इश्क़ के बारे में कैसे सोचती हैं?

जो भावना आपको काम से अलग न करे, बल्कि जो काम को बढ़ाए और आप उस काम को पा कर उस इश्क़ की तृप्ति को महसूस करें, तो वह इश्क़ है। मेरे खयाल से मैं इस बात में रवीन्द्र नाथ ठाकुर को कोट करूंगी- Life is kept evergreen by death, I would say- Love is also kept evergreen by death. One love is die than another is born, is what keeps love alive.

बुद्धिज़्म के बाद क्या करेंगी?

मैंने अभी एक बड़ा प्रोजेक्ट खत्म किया है नेशनल इंदिरा गांधी सेंटर फाॅर आर्ट्स के साथ, वो है अर्ली उर्दू राइटिंग, इंडिया में। तो 1900 से लेकर 1950 तक का दौर कवर किया है, जो चार वाल्यूम्स में है। दो फिक्शन, एक पोएट्री और एक नाॅन फिक्शन है।

अब नेक्स्ट 14 सितम्बर को मैं जा रही हूं सेंट्रल एशिया, वहां प्रोजेक्ट यही है कि सिल्क रूट के ऊपर बुद्धिज़्म का कैसे विकास हुआ, क्या आर्ट सेंटर्स हैं। ये ट्रेड रूट ही था और मेरी पीएचडी इस पर है कि ये रूट जो डेवलप हुआ, किन किन धर्मों से इस में बदलाव आया। ‘सिल्क रूट’ यानि बनारस से शुरू होकर चाइना, तिब्बत होते हुए फिर सेंट्रल एशिया पहुंचता है और फिर रोम पहुंचता है। तो उस रूट पर, ऐसा मेरा मानना है, जो मेरी बेसिक रिसर्च है कि उस पर सबसे ज्यादा बुद्धिज़्म फैला। वहां पर सेन्टर्स बने, बुद्धिस्ट मठ बने, कल्चरल डेवलपमेंट्स हुए, जातक टेल्स पहुंची। तो वो जो मुस्लिम हो गए हैं इलाके, उनमें बुद्धिज़्म अन्दरूनी तौर पर कैसे सरवाइव कर रहा है, कैसे वो घुल मिल गया है इस्लाम के अन्दर क्योंकि उनका इस्लाम बहुत मुख़्तलिफ है। वो तालिबानी इस्लाम नहीं है। उसमें डांस भी है म्यूज़िक भी है, गाने भी हैं, नाटक भी हैं, तो वह कैसे सरवाइव किया । 

अनुजा 

(सुपर आइडिया में प्रकाशित)