“दादू चाय’’! लड़का उनके सामने चाय का गिलास रख गया। वे बड़ी देर तक चाय के गिलास से निकलने वाले धुएँ को देखते रहे और अतीत की सुनहरी गलियों में भटकते रहे। जीवन के वे सुनहरे दिन आज एक सपना सा हो गए हैं। कौन जाने वो समय कभी अब लौटकर आएगा भी या नहीं! गर्दिश में तो सांत्वना की एक राह बस वो यादें ही होती हैं, जो मन को कचोटती भी हैं] संतोष भी देती हैं और सहलाती भी हैं।
रंगमंच
के जिस सुनहरे सपने को उन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया था] उसने उन्हें पुराने दीमक लगे फ्रेम की तरह
भुला दिया। एक समय था]
जब
उन्होंने इसी रंगमंच पर अपने अभिनय के जादू से अपार भीड़ को बाँधकर रखा था। जब
तालियों की गड़गड़ाहट सदैव इस नट सम्राट के आगमन का अद्भुत स्वागत किया करती थी। जब
रंगमंच पर इस किरदार के प्रवेश करते ही जादुई खामोशी छा जाती थी। अपने एकाकीपन में
आज यदि वो उसी कोलाहल और शांति के अद्भुत मिश्रण से बने हुए स्वागत को ढूँढते हैं
तो हार जाते हैं।
उनका भव्य व्यक्तित्व और अभिनय की सजीवता दर्शकों को इस प्रकार बाँधती थी कि थोड़ी देर को वह स्वयं निःशेष हो जाता था। विशाल] सुगठित शरीर] सौम्यता के तेज से दमकता गौर वर्ण] चमकीले कुंचित केश] तीक्ष्ण नासिका] निरभ्र आकाश सी शून्य किंतु बोलती आँखें व मंद सहज स्मित से सजे अधरपुट। संतुलित] सहज] सौम्य व्यक्तित्व की शोभा को बढ़ाती हुई उनकी ब्रासलेट की बंगाली परिपाटी से बँधी धोती] सिल्क का कलफ़ किया कुर्ता] और उसपर ऊनी शाल। आज भी उनके व्यक्तित्व की भव्यता और गरिमा की छाप शेष है। चाहे उनके काले केशों में सफ़ेद तारों की संख्या बढ़ती जा रही है या वार्धक्य के स्पष्ट चिन्ह उनके चेहरे पर प्रतिबिंबित हैं। चाहे आज वो ब्रासलेट की धोती और सिल्क के कलफ़ किए कुर्ते से सुसज्जित नहीं हैं] तो भी एक ही दृष्टि में उनका व्यक्तित्व किसी भी व्यक्ति को सहज ही बाँध सकता है।
दो
पुत्रों] एक पुत्री और पत्नी के
साथ अपने सुखी]
समृद्ध
परिवार में जीने वाले नट-सम्राट उल्लास बाबू आज अपने संसार में बिल्कुल ही एकाकी
रह गए हैं। पत्नी के ढांढस बँधाने वाले सहयोग ने पिछले ही वर्ष उनका साथ छोड़ दिया
था। पुत्री अपने जीवन में रमी थी। पुत्र व पुत्रवधुएँ अपनी व्यस्तताओं में बँधे
थे। कड़े अनुशासन और अपनी व्यस्त दिनचर्या में लगे पोते-पोतियाँ शायद ही कभी अपने
दादा जी के साथ खेलने का अवसर पाते रहे हों। नाट्य समाज ने उनकी तमाम उपलब्धियों
के साथ उन्हें अनुपयुक्त जानकार भुला दिया था। बस कमरे में रखी चमकती हुई अनगिनत ट्राफियाँ
ही इस ‘नट-सम्राट’ की उपाधि व उपलब्धियों की याद दिलाती थीं। शायद वे नए समय से
अपने को जोड़ नहीं पाए। इसीलिए हवेली जैसे विशाल नीड़ और अभिनय की अतल गहराइयों में
न रम सके और अभिनय के समस्त पड़ावों को पार करते हुए आज बिल्कुल निस्संग] बिल्कुल एकाकी बैठे थे। अपना सहारा अपनी
ही कुंठा] अपनी ही विवशता और अपना
ही आक्रोश थे।
^^लल्लू] ये रहे चाय के पैसे!’’ पैसे प्लेट में
रखकर उन्होंने कुर्सी की पीठ पर टँगी अपनी छड़ी उठाई और धीरे-धीरे बाहर चले गए।
निरुद्देश्य से मानो अपनी ही दुनिया में डूबे हुए वे चले जा रहे थे कि एक गाड़ी
उनके पास आकर रुकी। वे हल्का सा चैंककर रुके] और प्रश्नवाचक दृष्टि से उधर देखा। गाड़ी चालक ने उन्हें प्रणाम
किया। अपरिचय का भाव उनकी दृष्टि में झलक उठा। वो एक लड़की थी-अपरिचित। हाथ में
कैमरा] एक बैग और एक पर्स। करीने
से कटे बालों को झटका देते हुए उसने आँखों पर चढ़ा रंगीन चश्मा उतारा और व्यावसायिक
मुसकान के साथ बोली-‘‘मैं आकांक्षा पत्रिका से हूँ। मेरा नाम निमिषा है] आपकी अभिनय कला की जबरदस्त प्रशंसक हूँ।
पिछले 14&15 बरसों से आपके नाटकों की
नियमित दर्शक हूँ। गए 2 बरसों से आप नाटकों से
बिल्कुल बाहर हो गए हैं। यह बात मुझे तब पता चली] जब पिछले महीने मैं बाहर से लौटी। एक-दो
नाटक भी देखे इस अंतराल में] पर कोई ऐसा प्रभावशाली पात्र नहीं दिखा जो दर्शकों को बाँधकर
तीन-चार घंटों के लिए बैठा सके। तभी से आपको पता ढूँढने का प्रयास कर रही हूँ। कल
किसी हमदर्द से आपका पता पाकर आपका घर खोजने निकली तो लीजिए] आपसे भेंट ही हो गई।’’ वह हँस पड़ी।
मुस्कुराए
उल्लास बाबू-‘‘यह तो मेरे लिए गौरव की बात है कि तुम मेरी प्रशंसक हो] पर तुम मुझमें अभिनय की इति नहीं मान
सकतीं। क्योंकि ऐसा करके तुम उन कलाकारों के परिश्रम की उपेक्षा कर रही हो] जो नई दृष्टि को लेकर] नए उत्साह के साथ मंच पर उतरे हैं। हरेक
कलाकार की कुछ न कुछ विशेषता होती है। उसे नकारकर हम किसी के सही आलोचक या प्रशंसक
नहीं बन सकते। खैर! तुम बताओ] मुझसे कोई विशेष आग्रह** कुछ रुककर वे बोले।
^^जी हाँ] काम तो कुछ विशेष ही है। पर यहाँ.....\**
^^तो कल घर आ जाओ] सुबह 9 बजे।’’
^^जी’’ निमिषा ने कहा और
उनसे विदा ली।
दूसरे
दिन सुबह 9 बजे निमिषा ने उनकी बैठक
ने प्रवेश किया। बैठक की साज-सज्जा गृहस्वामिनी की सुरुचि-संपन्नता का परिचय दे
रही थी।
^^आप बैठिए] मैं उन्हें बुलाती हूँ।’’ उसे बैठाने वाली
महिला सहसा पर्दे के पीछे जाकर अदृश्य हो गई। निमिषा बैठक का निरीक्षण कर रही थी।
नक्काशीदार लकड़ी का सोफा और चमकती हुई कुर्सियाँ स्वच्छता के प्रति गृहणी के
अनुराग की विवेचना कर रही थीं। पूरे कमरे में चटख रंगों के सम्मिश्रण से बना हुआ
कालीन बिछा हुआ था। शीशे की खिड़कियों से बाहर रंग-बिरंगे पुष्पों की लहराती हुई
छटा दिख रही थी। छत पर लगा हुआ फानूस अचानक बल्बों की रौशनी से जगमगाकर बुझ गया तो
निमिषा ने उधर देखा। ‘शायद किसी बच्चे की शरारत हो’ एक मुस्कान उसके होंठों तक आकर
लौट गई। एक ओर कार्निस पर नटराज की सुंदर मूर्ति स्थित थी। नीचे आतिशदान में चीड़
की लकड़ियाँ जलने की प्रतीक्षा कर रही थीं। पास ही शीशे की अल्मारी में अनेक ट्राॅफियाँ
गृहस्वामी के शानदार अतीत की कहानी सुना रही थीं।
^^क्या देख रही हो’’\ अचानक उल्लास बाबू का स्वर सुनकर वह
मुड़ी-‘‘कुछ नहीं]
देख
रही थी कि अतीत की चमक कैसे धुँधली पड़ती है’’।
^^आओ’’] उल्लास बाबू मुड़े-‘‘चाय-काॅफी] कुछ लेना पसंद करोगी’’\
^^हाँ] काॅफी ले लूँगी।’’ फिर उल्लास बाबू को
कोने में लगी इलेक्ट्रिक केतली की ओर जाते देख बोली] ^^आप बनाएँगे क्या\**
^^हाँ] क्यों\ तुम्हें भय है कि मैं काॅफी अच्छी नहीं बनाऊँगा।’’ वे हँसे।
^^नहीं] मेरा मतलब था....!’’ उसने बात अधूरी छोड़
दी।
^^सब लोग हैं मेरे घर में] पर अपना काम मैं स्वयं करता हूँ।’’
उन्होंने उसकी अधूरी बात पूरी करते हुए कहा।
^^लो।’’
काॅफी का कप उसे पकड़ाते हुए उन्होंने बिस्किट का डिब्बा खोला-‘‘बिस्किट’’\
^^नहीं] धन्यवाद!’’ वो मुस्कुराई- ‘‘मैं आपकी
ट्राॅफीज़ की एक तस्वीर लेना चाहती हूँ।’’
^^क्यों’’\
^^यह तो सोचा ही नहीं।’’
उसने कैमरे की रील सेट की-‘‘आप इधर आ जाइए] नटराज के साथ आपकी एक तस्वीर प्लीज़।’’ निमिषा ने उन्हें संकेत
किया।
जैसे
सर्प बीन की आवाज़ और सपेरे की शैली पर मुग्ध हो झूमने लगता है] उल्लास बाबू इस लड़की के प्रभाव से
मंत्रमुग्ध को बैठ गए।
^आपकी
पत्नी! उनके साथ भी एक तस्वीर लेना चाहती हूँ।’
^उनके साथ मेरी कोई तस्वीर
न ले पाओगी।’ उनके गले में कुछ अटक गया।
^क्यों’\ निमिषा ने अचम्भे से देखा।
^वह अब नहीं हैं।’
^ओह’! निमिषा मानो स्वयं
ही रुक गई-‘आई एम साॅरी’।
थोड़ी
देर को मानो समय ठहर गया। काॅफी ख़त्म करके निमिषा ने विभिन्न एंगेल्स से उनकी
अनेक तस्वीरें लीं। स्टडी में पढ़ते हुए] लिखते हुए] किचन में मनपसंद डिश बनाते हुए] विचारों में डूबे हुए] घूमते हुए] नाटक की विभिन्न मुद्राओं में] और पुरस्कार ग्रहण करते हुए। कुछ अतीत की
तस्वीरों से उनके परिवार]
पत्नी
आदि का परिचय प्राप्त किया। इस सारी प्रक्रिया में उसे लगभग सारा दिन लग गया। शाम
को अँधेरा ढलते ही वो चलने को उद्यत हुई-‘‘आप कल का समय मुझे दे सकते हैं\**
^हाँ]हाँ क्यों नहीं! मैं भी बूढ़ा हो ही चुका
हूँ। अकेले बैठा रहता हूँ। तुम्हारे साथ बातचीत में आज का दिन पता ही नहीं चला।’
^ठीक
है] मैं कल आऊँगी।’ वो उठी।
^वो तो ठीक है’] उल्लास बाबू हँसे-‘पर एक बात बताओ] शतरंज खेल लेती हो\*
^जी हाँ।’
^तो ठीक है] एक बाजी शतरंज की जमेगी और मैं तुम्हें सब
बताऊँगा। और हाँ]
हो
सके तो इसे लिखने का कारण सोचकर आना। अन्यथा तुम्हारा यह विचार-मंथन व साक्षात्कार
नीरस जीवनी के अतिरिक्त अन्य कुछ न रह जाएगा। रसिकता का पुट डाले बिना रचना
लोकप्रियता नहीं प्राप्त करती!’
^^आप लेखन के क्षेत्र में
भी दखल रखते हैं\**
निमिषा
हँसी।
^नहीं] पर रस के बिना कलाकार अधूरा होता है। इसलिए हमारा ध्यान रसो पर पूर्णतः केन्द्रित रहता है।
दूसरे दिन बैठक से लगे बराम्बदे में शतरंज की बाजी और काॅफी के कप के साथ वे बातचीत करने बैठे। बराम्बदे में लगे क्रोटन और लटकती हुई बेलें माली के अनथक परिश्रम व परिवार की प्रकृतिप्रियता की ओर संकेत कर रही थी। पैदल को आगे बढ़ाते हुए मृदु हास्य के साथ वे बोले-‘‘पूछो] क्या जानना चाहती हो मेरे बारे में\ वैसे’’] कुछ रुककर उन्होंने कहा-‘‘मुझे समझ में नहीं आया कि मुझ बूढ़े पर किताब लिखकर तुम्हें क्या मिलेगा\**
^हाँ] मैंने सोच लिया है’] उनकी चाल का जवाब देकर वह बोली-‘खुशी मिलेगी मुझे कि मैं नाट्य समाज को एक बार सोचने पर विवश कर सकँूगी कि जिस महान अभिनेता को उन्होंने जीवित रहते ही भुला दिया है] उस जैसा एक भी अदाकार नहीं है उनके पास।’
एक
करुण मुसकान के साथ वे बोले-‘नहीं] मैं संतुष्ट हूँ।’
^आपको गुस्सा नहीं आता\* निमिषा क्षुब्ध थी।
^नहीं] दुःख होता है अपनी
असमर्थता और दुर्बलता पर!’
^क्या
मतलब\* वह चकित थी।
^समय के साथ जो मनुष्य
स्वयं को नहीं बदलता वो पिछड़ जाता है। कला की साधना करने के लिए स्वयं को अपने सुख
और दुःख से निरपेक्ष रखना पड़ता है। मैं नहीं कर पाया। मेरी दुर्बलता मुझे मेरे
दुःख से पराजित कर गई। इसलिए मैं भुला दिया गया। तुम अपनी बात करो।’ कुछ रुककर वे
बोले।
^आप थियेटर की ओर क्यों आकर्षित हुए जबकि और भी दूसरे माध्यम हैं] जो आपको शोहरत] दौलत] इज़्ज़त सब दे सकते थे\]
^लंबी कहानी है।’
^कहिए।’
^मैं
पुरनिया गाँव का रहने वाला हँू।’ उल्लास बाबू अगली चाल को भूलकर अतीत में खो
गए-‘मेरे पिता चार भाई थे। परिवार संपन्न था] बल्कि कहना चाहिए] रईस था। मेरे पिता से बड़े दो भाई थे] एक छोटे भाई थे। गाँव में काफी पैतृक
संपत्ति थी। परिवार के संयुक्त व परंपरावादी रहन-सहन होने के कारण हम अपने
पारिवारिक नियमों को उल्लंघन नहीं कर सकते थे। दिखावे से दूर सादा जीवन जीने वाले
ग्रामीणों के बीच पढ़े-लिखे और रईस होने के कारण वे स्वतः ही प्रधान बन गए थे।
गाँववालों के छोटे-मोटे झगड़ों का निपटारा करना] उत्सवों में मुख्य अतिथि की तरह शामिल होना व दुःखों में सबकी
साझेदारी करना]
यही
हमारे परिवार की खुशहाल व सीधी-सादी ज़िंदगी थी। दादी पिता के बचपन में ही गुज़र गईं
थीं व दादा जी दादी के दुःख में सन्यास ले न जाने कहाँ चले गए। अब तो शायद हों भी
न। असमय ही परिवार की सारी ज़िम्मेदारी हमारे ताऊ पर आ पड़ी। उन्होंने परिवार की
बागडोर सँभाली और माता-पिता का दायित्व पूर्ण करते हुए भाइयों का पालन-पोषण करने
लगे। प्राथमिक शिक्षा पूरी करके सभी भाई शहर पढ़ने को गए। वहीं थियेटर से, नाटक से उनका परिचय हुआ। दोनों छोटे भाई
तो पढ़ने में व्यस्त हो गए पर मँझले ताऊ कामताप्रसाद जी] थियेटर के] नाटक के अध्ययन पर ही मानो लग गए। गाँव की
नौंटंकी और नाटक के मूलभूत अंतर ने ही उनको इस ओर आकर्षित किया। अपनी शिक्षा पूरी
करके जब वे गाँव वापस गए तो ग्रामीण नौटंकी के कलाकारों से नाटक करने का प्रस्ताव
रखा। उनके प्रयासों से नाटक गाँव की चैपाल पर खेला जाने लगा। वे स्वयं भी इसमें
भाग लेते और साथ में नाटक देखने के लिए न सिर्फ मुझे ले जाते, वरन् बाल-पात्रों के अभिनय में भी शामिल
करते।’’
^^आप!’’ निमिषा ने
टोका-‘‘आपके पिता तो पढ़ रहे थे शहर में!’’
^^हाँ] पर हमारे यहाँ गाँव में विवाह कम उम्र में
ही हो जाते हैं। मेरे पिता का विवाह भी 14&15 बरस की आयु में हो गया था। माँ गाँव में
थीं। पिता शहर में पढ़ते थे। मैं अकेला बेटा था तीनों भाइयों में। चाचा ने अब तक
विवाह नहीं किया था। मँझले ताऊ के दो बेटियाँ थीं। बड़े ताऊ ने अलगाव के डर से कभी
विवाह नहीं किया। अतः तब मैं ही परिवार का एकमात्र पुत्र था। नाटकों में इस सक्रिय
योगदान के कारण मेरा रुझान नाटकों की ओर बढ़ा। किंतु गाँव का परिवेश एक परिवार का
सा होता है। अतः उसमें किए गए अभिनय पर किसी को आपत्ति नहीं थी। पर काॅलेज से
निकलकर जब मैंने एन.एस.डी.में प्रवेश लेने की बात कही तो घर में कड़ा विरोध हुआ।
माँ ने मुझसे बात करनी बंद कर दी। पिता ने बहुत फटकारा-‘‘भाँडों की तरह सबके सामने
नाचने-गाने वाले कुल के नहीं हैं हम। नाक कटवाने का काम मत करो। मैंने तो पहले ही
मना किया था कि इसे शहर मत भेजो। इसके लक्षण ठीक नहीं हैं। कौन संस्कारी परिवार
इसे अपनी बेटी देगा\
पूरे
कुल का नाम डुबोएगा। बूड़ा वंश कबीर का उपजा पूत कमाल आदि-आदि। और भी न जाने कितनी
उक्तियों] कहावतों की चाशनी मिलाकर
मुझे डाँटा गया]
फटकारा
गया] किंतु मैं टस से मस नहीं
हुआ। फिर इकलौता पुत्र होने का फायदा तो मुझे मिलेगा ही] यह दृढ़ विश्वास भी था। और हुआ भी यही। बड़े
ताऊ मुझे कभी दुःखी नहीं देख सकते थे] यद्यपि कि अनुशासन के मामले में वे बड़े सख़्त थे। उन्होंने पिता
से कहा-‘कृष्णा]
इसपर
इतना तो अधिकार मेरा भी बनता ही है कि मैं भी इसके बारे में कोई निर्णय ले सकूँ।’
^^दादा’’] मेरे पिता शांत क्रोध के साथ बोले- ‘‘बेटा आपका ही है तो भी मैं आपको इस विषय में इसका पक्ष नहीं लेने दूँगा। अगर यह गया तो मैं संपत्ति से इसे बेदखल कर दूँगा। ट्रस्ट बना दूँगा पर एक कौड़ी भी इसे नहीं लेने दूँगा।’’
^^दादा] अकेला लड़का है। यह भी बाहर निकल गया तो घर
कौन सँभालेगा\**
माँ
भी घूँघट की ओट से बोली।
^^बेटा] चढ़ती हुई नदी और जवानी के वेग को बाँधा
नहीं जा सकता। बच्चा है]
खून
गरम है] कुछ दिन अपने मन की कर
लेने दो] जहाँ नून] तेल] लकड़ी में जुटा] खुद ही लौट आएगा। यों बाँधोगी तो अगर भाग गया तो कैसे लौट के
आयेगा\** कुछ रुककर पिता से
बोले-‘‘मैंने ये बाल धूप में नहीं सफेद किए हैं कृष्णा] मेरा विश्वास मानो] बबुआ लौट आएगा।’’
^^बबुआ\** निमिषा ने टोका।
^^मेरा बचपन का नाम था। बस
ताऊ की इस सिफ़ारिश से मैंने एन.एस.डी.ज्वाइन की और अभिनय के क्षेत्र में उतर गया।
‘एक और अपूर्व’ और ‘टूटते किनारे’ इसी के आस-पास के नाटक हैं। बस] इसी तरह नाटकों से जुड़ गया।’’ वे चुप हो
गए।
^^लेकिन आपके ताऊ के उस विश्वास का क्या हुआ जिसपर उन्होंने आपको अनुमति दी थी एन.एस.डी. में प्रवेश लेने की\** निमिषा ने कुछ रुककर पूछा।
हँस पड़े उल्लास बाबू। शायद अतीत की किसी सुरम्य स्मृति स्थली से जुड़ गए थे-‘‘इसका भी बड़ा प्रयास किया गया। नून] तेल] लकड़ी में फँसाने की व्यवस्था की गई लेकिन परिंदों के पर आज तक कोई बाँधकर नहीं रख सका है।’’
^^कैसे\** निमिषा उत्सुक हो उठी।
^^हाँ] यह भी एक कहानी ही है।’’ उन्होंने एक गहरी
साँस ली-‘‘एक छुट्टी में जब मैं घर लौटा तो देखा घर में अपार उत्सव की तैयारियाँ
हैं। पूछा] तो पता लगा] मेरा विवाह तय कर दिया गया है। यह तो
सौभाग्य कि मेरी पत्नी बड़ी योग्य थी। पढ़ी-लिखी व अध्ययनशील थी] समझदार व मेरी रूचि में सहयोग करने वाली
थी। बस] मैं उसको लेकर शहर आ गया।
मेरा और चाचा का विवाह एक साथ हुआ था। उनकी पत्नी] मेरी माँ व ताई वहीं रहीं। बस मैं ही शहर
का बाशिंदा हो गया। उन दिनों नौकरी मिलने में अब सी दिक्कतें नहीं आती थीं। मुझे
एक अच्छी सी कंपनी में नौकरी मिल गई। तनख़्वाह अच्छी थी। घर भी बनवा लिया और आराम
से ज़िंदगी कटने लगी। मन]
लेकिन
बहुत बेचैन था। ऐसा लगता था कि जो कुछ करने का निश्चय लेकर आया था] उससे कहीं कुछ छूट रहा हूँ। बस] पत्नी से बिना कुछ कहे एक दिन घर व नौकरी
छोड़कर चला गया। तब मेरा बड़ा बेटा व बेटी थे। वैसे तो मेरी पत्नी बहुत धैर्यवाली थी
पर एक माह तक जब कोई सूचना नहीं मिली तो वह परेशान हुई। उसने गाँव ख़बर भेजी।
माँ-बाबू जी आए। उसे गाँव वापस चलने को कहा] बहुत मनाया] पर उसने मना कर दिया। एक हायर सेकेंडरी स्कूल में नौकरी कर ली और
बच्चों का पालन-पोषण करने लगी।
इधर मैं सोचता रहा] भटकता रहा] कहीं मन को शांति नहीं मिली। आत्म-चिंतन की प्रक्रिया से पाया कि मन के कलाकार की भूख मिटाए बिना शांति नहीं मिलेगी। बस] मंच पर आ गया। मंच से जुड़कर ही सच में मन को शांति मिली। वापस घर लौटा] तकरीबन तीन महीनों के बाद। इतने दिन की बिछुड़न में जो कुछ सहा] देखा था] सब कहते सुनते कुछ और दिन बीते। हमारे बीच समझौता हुआ। पत्नी ने कहा कि मैं कहीं न जाऊँ। यहीं रहकर नाटकों और मंच से जुड़ा रहूँ। परिवार की फिक्र करने की मुझे ज़रूरत नहीं] वह अपनी आय से घर चला लेगी। सच तो यह है कि मेरी सफलता के मूल में मेरी पत्नी का त्याग] कर्मठता] विद्वत्ता व समझदारी ही है] जिसने मुझे ‘नट-सम्राट’ की उपाधि तक पहुँचाया। संघर्ष के जिस भयावह रेगिस्तान से मैं गुज़रा हूँ] उसकी निराशाओं और परेशानियों से मैं टूट गया होता पर मेरी पत्नी की सहिष्णुता और साहस से ही आज मैं यहाँ हूँ।’’
^^अर्थात्
आप मानते हैं कि हर सफल पुरुष के पीछे एक स्त्री होती है।’’ निमिषा ने पूछा।
^^हाँ] निस्संदेह! अन्यथा मैं तो हारकर जीवन से
समझौता कर लेता और कहीं क़लम घिसकर चार पैसे कमाये होते’’-अपने प्रवाह को उन्होंने
नहीं तोड़ा-‘‘स्त्री सर्वसहा धरित्री ही नहीं होती बेटा] वह तो वो पायदान भी है हमारे समाज में] जिसपर पाँव पोंछकर हम अपने पाँवों को
स्वच्छ] सुंदर और आकर्षक बनाते
हैं। किंतु मेरी पत्नी इन सबसे अलग कुछ अलग व्यक्तित्व की थी। दृढ़ता] कर्मठता] क्षमा] करुणा]
दया] उदारता के अद्भुत मिश्रण से बनी थी वह।
उसने मुझे समस्त पारिवारिक ज़िम्मेदारियों से मुक्त किया। स्वयं काम किया और मुझे
कला के लिए समर्पित होने की प्रेरणा दी। वो एक अद्भुत समीक्षक व आलोचक भी थी। मेरे
काम की अच्छाइयों-बुराइयों की समीक्षा करके उन्हें बेहतर बनाने के तरीके बताती
और....!’’
^^कभी आपका अहं नहीं टकराया
उनकी इस समीक्षा से\**
निमिषा
ने पूछा।
एक
क्षण को सोच में पड़ गए उल्लास बाबू] फिर बोले- निमिषा] क्या ख़्याल है यदि इस प्रश्न का उत्तर मैं विचारकर दूँ\**
^^हाँ] बेशक]** वो मुस्कुराई-‘‘बात बनाने की तो नहीं सोच
रहे हैं\**
^^अरे नहीं’’] वे हँसे-‘‘इस उम्र में बातें बनाऊँगा] झूठ बोलूँगा तो ईश्वर को क्या मुँह
दिखाऊँगा\ खै़र! तीन बज रहा है।
काॅफी पियोगी\**
वे
उठे।
^^हाँ] पर इस बार मैं बनाऊँगी।’’
^^ठीक है।’’ वे दोनों अंदर
आए।
^^आपकी उम्र कितनी होगी\** काॅफी बनाते हुए निमिषा ने पूछा।
^^मेरी’’! वे कुछ हिसाब
लगाने लगे। कुछ देर बाद बोले-‘‘सड़सठ-अड़सठ (67&68½ के आस-पास होगी।’’
^^अरे’’ निमिषा ने कप देते
हुए कहा-‘‘इतने के तो नहीं लगते आप।’’
ठहाका
लगाकर हँस पड़े इस बार उल्लास बाबू-‘‘गाँव की शुद्ध हवा में साँसें ली हैं। विशुद्ध
दूध-दही का सेवन किया है। जीवन और आत्मा की तरह शरीर भी पौष्टिक] स्वादिष्ट] निश्छल और संयमित खु़राक से बना है] इसीलिए।’’
^^हाँ] पर गाँव की वैचारिक संकीर्णता और
रूढ़िवादिता से मुक्त थी वह। समय के बहाव में कैसे सुरक्षित निकलना है, यह वह भली-भाँति जानती-समझती थी।’’ इसके
बाद वे दोनों ही मौन हो गए। काफी देर बाद इस मौन को उल्लास बाबू ने ही तोड़ा-‘‘यह
कहना कि कभी भी मेरा अहं नहीं टकराया] ग़लत होगा]
पर
यह अक्सर या बहुत बार हुआ हो] यह कहना भी ग़लत होगा। शुरू में हुआ] पर धीरे-धीरे अनुभव के साथ यह साथ ही जाने
क्यों जीवन की समझ कुछ इस तरह पैठ गई हममें कि इस समीक्षा को मैं अहंकार की दृष्टि
से नहीं सका और शायद यह उसकी समीक्षा शैली का भी प्रभाव था कि कमी सुधर भी जाती और
आत्महीनता भी नहीं महसूस होती थी। हमेशा ही जब मैं कभी कमज़ोर पड़ने लगा] एक मज़बूत तने की तरह उसने
मुझे सहारा दिया]
पल्लवित
और पोषित किया। माँ]
बाबू] ताऊ की मृत्यु हो] बच्चों की बीमारी हो या आर्थिक परेशानी] इस सबसे वो मुझे बचाकर यों निकाल लाई] जैसे माँ बच्चे को घनघोर वर्षा में भीगकर
अपनी स्नेहछाया में छुपाकर निकाल लाती है। इस मकान के शेष अधबने हिस्से को पूराकर
घर बनाने में जब उसके पसीने की बूँदें बहीं] तब भी मैं टूटा कि उसके लिए मैंने कुछ
नहीं किया। जो मुझे करना चाहिए था] वह उसने किया। पर उसने तब भी मुझे यही कहकर सहारा दिया] बल दिया कि ‘तुम्हीं ने तो बनाया है सब।
मूलतः प्रेरणा तो तुम्हारी ही है।’ पर मैं जानता हूँ कि मैं नहीं उसकी आत्मशक्ति
ही मेरी प्रेरणा थी। मेरे बच्चे उसी के सुसंस्कारों और अनथक परिश्रम के कारण आज] उन मुकामों तक पहुँच सके हैं] जहाँ वो हैं। अपनी माँ के व्यक्तित्व की
पूर्ण छाप है उनके ऊपर। संघर्ष के कठिन दौर में साहस] लगन और परिश्रम के सहारे ही वे उस स्थान
को पा सके] जो सामाजिक दृष्टि से
इज़्ज़त का स्थान कहा जा सकता है। घर के प्रत्येक संघर्ष को अपना जानकर जो वे अपना
सके और बिना डरे या दुःखी हुए वे जो इससे सहजता से निकल सके] यह उनकी माँ की शिक्षा और परिवार के प्रति
लोकतांत्रिक दृष्टिकोण के कारण ही संभव हो सका। परिवार की सारी ज़िम्मेदारियों में
उसने मेरी व अपनी दोनों की भूमिका एक साथ निभाई। सारे परिवार को एक सूत्र में
बाँधकर एकाकी ही समस्त दायित्वों को वहन करने की जो खूबी उसके अंदर थी] वो बहुत कम लोगों में देखने को आती है।’’
वे एक गहरी साँस खींचकर चुप हो गए।
^^मतलब कि वे एक धुरी थीं] जिसके चारों ओर आपका परिवार जब तक घूमता
रहेगा] बिखरेगा नहीं।’’ चुप्पी
को तोड़ते हुए निमिषा ने पूछा।
^^निश्चय ही।’’
^^आपने फिर कभी कहीं काम
नहीं किया\**
^^नहीं] ऐसा नहीं है। एक टाइप स्कूल में कुछ समय
काम किया पर वह बहुत दिनों तक चल नहीं सका।’’और इसके बाद एक गहरा सन्नाटा पसर गया
वहाँ। सब अपने में डूबा हुआ] अपने से जुड़ा हुआ] मानो भित्तियाँ ही हों और कुछ नहीं। बस उनके ही सरकने की आवाज़
सुनाई पड़ रही थी। कितना ही समय ऐसे बीत गया। अचानक ही पूर्वी कोने में लगी नीम पर
कोई पक्षी बोला तो जैसे वे चैंककर जागे-‘‘अरे] पाँच बज गया!’’
^^आपने कैसे जाना\**
^^ये जो तूती है न] यह ठीक पाँच बजे रोज़ इसी नीम से बोलती
है।’’
^^तूती\** निमिषा ने पूछा
^^यह पक्षी] इसका नाम मैंने तूती रख दिया है। मालूम
नहीं कौन सा पक्षी है।’’ मुस्कुराये वे।
^^ओह!’’ निमिषा
हँसी-‘‘दिखाई पड़ती है यहाँ से\**
^^दिखाई तो पड़ती है पर अब
तक उड़ गई होगी। एक बार पुकारकर उड़ जाती है।’’
^^अच्छा] आपने नाटक को क्यों छोड़ दिया\** निमिषा ने कुछ क्षणों के बाद पूछा।
^^अँ’’ मानो अपनी ख़ामोशी
से बातें करते हुए वे जगे-‘‘इसकी वजह कोई एक तो हो सकती है, पर जहाँ तक मैं समझता हूँ सिर्फ़ एक ही
नहीं है।’’
^^मसलन’’\ निमिषा ने पूछा-‘‘कौन-कौन सी वजहें हैं\**
^^एक तो यही कि मैं आए हुए
समय और उसकी ज़रूरतों के साथ नहीं जी सका। हमारे लिए मंच एक कर्मक्षेत्र था] एक यज्ञभूमि] जिसमें अपना सबकुछ होम करके उस संतोष को
पाया जाता था जो हमारे लिए यज्ञाहुति के समान संसार के प्रत्येक धन से अधिक
मूल्यवान होता था। अभिव्यक्ति की एक छटपटाहट थी हमारे भीतर] जिसे शांत करने के लिए हमने मंच को चुना
था। आज का कलाकार इस प्यास के लिए नाटक को नहीं चुनता। अनुशासनहीनता व स्वच्छंदता
बढ़ गई है। इस माहौल से समझौता करना मुश्किल है, कम से कम मेरे लिए।’’
^^और खास कारण\** निमिषा ने पूछा।
^^मेरी पत्नी!’’
^^वो कैसे\ नाटकों से तो आप विवाह के पहले से जुड़े
हैं।’’
^^हाँ] यह तो ठीक है] पर अगर वह न होती तो यह क्रम आगे बढ़ना
शायद मुश्किल था। दूसरे शब्दों में वह मेरी प्रेरणा थी। यह कह सकती हो। मैं
तुम्हें बता चुका हूँ यह।’’
^^आपको अपने किस पात्र का
अभिनय सबसे ज़्यादा प्रिय है\**
^^नट-सम्राट नाटक में जो
‘नट-सम्राट’ का पात्र था]
वह।’’
^^क्यों’’\
^^शायद मैं उसमें अपना
भविष्य देख रहा था या यह कह लो कि यह एक कलाकार का भय था] जिसे वह सब पर व्यक्त नहीं कर सकता। उसने
मुझे सबसे ज़्यादा छू लिया था] विशेषकर बाद वाली स्थिति ने।’’
^^आपने निर्देशन या लेखन
में क्यों नहीं प्रयास किया\**
^^एक तो मेरा रुझान अभिनय
के प्रति ही अधिक था]
दूसरे
मेरी प्रवृत्ति समझौतावादी नहीं है] कह चुका हूँ।’’
^^क्या आपको लगता है कि
अपनी पत्नी की मृत्यु के साथ आपने नाटकों को छोड़कर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दी है\**
निमिषा
से वे किसी ऐसे प्रश्न की उम्मीद में न थे। वे चुपचाप छत को घूरने लगे-‘‘पता
नहीं।’’
^^क्या आपको नहीं लगता कि
जिस स्थान पर आपको देखने के लिए वे सारा जीवन संघर्ष करती रहीं] आप उस स्थान तक नहीं पहुँच सके हैं।’’
^^शायद।’’ उनका स्वर जैसे
कुएँ से आ रहा था।
^^आप फिर से कोई शुरूआत
क्यों नहीं करते\**
उल्लास
बाबू का मौन ही शायद उनका उत्तर था।
^^आप निराश हैं क्या\** निमिषा ने फिर उन्हें कुरेदा।
^^संभवतः] काफी हद तक!’’
^^क्यों\**
^^मैं महसूस करता हूँ कि
मुझमें शक्ति नहीं है।’’
^^आपको अपनी प्रेरणा की
ताक़त] हिम्मत और काबिलियत पर
भरोसा नहीं रहा]
यही
कहना चाहते हैं आप\**
^^नहीं’’....!
उल्लास बाबू ने प्रतिवाद करना चाहा कि तभी निमिषा ने उनकी बात काट दी-‘‘जब ऐसा
नहीं है तो आप क्यों नहीं दूने उत्साह से उठ खड़े होते हैं\**
^^मैं अब अभिनय से नहीं जुड़
सकूँगा।’’
^^मंच के अतिरिक्त आप
नाटकों में कोई अन्य योगदान दें।’’
उल्लास
बाबू ने प्रश्नसूचक दृष्टि से उसे देखा] मानो पूछ रहे हों कि वह क्या कहना चाहती है] निमिषा ने भी इस दृष्टि का मतलब समझा और
बोली-‘‘एन.एस.डी. जैसी किसी संस्था का निर्माण कर इच्छुक अभ्यर्थियों के अनगढ़
अभिनय को दिशा दें। उन्हें अभिनय की बारीकियों में प्रवीण करें। गाँवों से पुनः
जुड़कर नाटक की विधा को वहाँ तक पहुँचाकर ग्रामीणों की सर्जनात्मक ऊर्जा के क्षरण
को रोकें। निराशा के अँधेरे से जूझकर आप कब तक जी सकेंगे अकेले\ अपनी जिजीविषा को अपनी प्रेरणा] साहस] अपनी पत्नी के साथ क्यों नहीं बाँधते] जो दिगंत में व्याप्त है। निमिषा की
खामोशी के साथ ही कमरा मानो स्पंदनहीन हो गया। भित्तियों का चलना रुक गया। साँसें
मौन हो गईं।
अगले दिन सुबह जब निमिषा आई तो वे तैयार खड़े थे-एक नए उत्साह] नए जोश के साथ। परिवार के सदस्य अचम्भित थे-‘‘बाबू जी गाँव जा रहे हैं।’’ उल्लास बाबू ने मुस्कुराकर निमिषा की ओर देखा-‘‘तुमने मेरी बिखरी हुई ऊर्जा को संचित करके एक बार फिर मुझे कर्मक्षेत्र में खड़ा कर दिया। गाँव से शुरू करके अपनी नाट्य संस्था ‘वर्धा’ को शहर लाऊँगा। तुम मुझसे तब मिलने आओगी न!’’ निमिषा ने मुस्कुराकर स्वीकृति में सिर हिलाया।
^^तो ठीक है] आधारशिला तुम्हीं रखो। लाओ 11@& रुपए चंदा।’’ वे हँसे।
^^यह वर्धा नाम आपको कैसे
सूझा’’\ रुपए उनके हाथ पर रखते
हुए निमिषा ने पूछा।
^^वर्धा ही तो मेरी पत्नी
का नाम है]
पर
तुम रुपए व्यर्थ में न दोगी। चतुर हो।’’
^^हाँ] साथ में एक तस्वीर भी।’’
^^अच्छा-अच्छा] ले लो।’’ उल्लास बाबू ज़ोर से हँसे और तेज़
क़दमों से चलते हुए निकलकर गाड़ी में बैठ गए] नई मंज़िल की तलाश में।
अनुजा
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें