शनिवार, 12 सितंबर 2026

'मानस के हंस’ की तलाश में मिर्ज़ा मण्डी


चौक धड़कन है शहर की । चौक आईना है लखनवी विरासत का । चौक के कोने-कोने से झांकता है लखनऊ और इसी चौक की बान वाली गली की मिर्ज़ा मण्डी में मकान....नहीं
] हवेली है ‘चौक यूनि
वर्सिटी’ के उस प्रखर विद्यार्थी की
] जिसकी कलम के द्वन्द्व की गवाह रही हैं उस हवेली की दीवारें] उसका आँगन । वो विद्यार्थी] जिसकी गणना साहित्य-जगत लखनऊ की लेखक-त्रयी में करता है और जिसे शहर अमृतलाल नागर के नाम से जानता है।

आज सन्नाटे में खड़ी हैं वक्त की नब्ज़ पर हाथ रखकर एक-एक पल का हिसाब रखने वाली हवेली। इतिहास में नाम दर्ज कराने वाले अनेक उपन्यासों की रचना प्रक्रिया में साझीदार रही हैं उस हवेली की दीवारें। आज वीरानी में] अकेलेपन से बतियाते हुए उन सारे शब्दों की प्रतिध्वनियों को सुनती है यह हवेली और तलाश करती है ‘मानस के हंस’ के उजले पंखों की फड़फड़ाहट को] किसी भटकती आत्मा के समान।

शहर की विरासत वैसे भी परिवार में उपेक्षित किसी बुज़ुर्ग की तरह पुरानी चीजों को उलटने-पलटने में व्यस्त है। न उससे बात करने वाला कोई है, न उसके बारे में सोचने वाला। सब अपने काल्पनिक सुनहरे भविष्य को पाने की अंधी दौड़ में लगे हैं।

पुराने लखनऊ की अधिकांश इमारतें और मकान स्थापत्य कला के नमूने कहे जा सकते हैं। अमृत लाल नागर की यह हवेली भी स्थापत्य कला का एक उदाहरण है। इसमें लगे टेराकोटा के खंभे और खूबसूरत जालियाँ सामान्य इमारतों में इस्तेमाल नहीं की गयी हैं।

इस हवेली की ऐतिहासिकता सिर्फ इसी परिप्रेक्ष्य में ही नहीं है कि यहाँ लखनऊ के उस उपन्यासकार ने अंतिम साँसें ली हैं जिसने लखनऊ को ‘हिन्दी का गढ़’ बनाने में अभूतपूर्व योगदान दिया है, बल्कि यह भी ऐतिहासिक महत्व की बात है कि यह कोठी आसफुद्दौला इमामबाड़े के साथ बनी है । नवाबों के ‘फैमिली बैंकर’ शैफुद्दौला से यह कोठी शाह मदन मोहन ने खरीदी थी । इसकी ऐतिहासिकता यह भी है कि यहाँ से आखिरी बार नेपाल के लिए जाते हुए बेगम हज़रतमहल इस कोठी के एक हिस्से में एक रात के लिए ठहरी थीं। सन् 1909 में शाह मदन मोहन ने यहाँ ‘लक्ष्मण साहित्य सदन’ की स्थापना की भी और यहाँ से नौ पुस्तकें भी छपी थीं। बाद में स्व. अमृतलाल नागर ने भी अपना अधिकांश लेखन-कार्य इसी कोठी में किया। नागर जी चौक में तीन मकानों में रहे। इस तीसरे मकान में वो 1957 के दिसम्बर माह में आए थे] जब उनकी पुत्री अचला का विवाह होना था। उस समय वो ‘शतरंज के मोहरे’ लिख रहे थे। उसके बाद अपनी अंतिम साँसों तक वो उसी कोठी से बँधे रहे।

आज सुनसान और बदहाल पड़ी है स्व. अमृतलाल नागर के 1958&90 तक के लेखकीय जीवन की गवाह वो कोठी। चौक साहित्य और संस्कृति का केन्द्र था कभी। ‘जैन दिगम्बर’ और ‘प्रबोधिनी परि’द’ नामक दो पुस्तकालय थे चौक में] जहां से नागर जी ने अध्ययन प्रारम्भ किया था] अब वहाँ इन पुस्तकालयों का नाम-ओ-निशान भी नहीं है।

^शहर में सांस्कृतिक शून्यता बढ़ रही है’] शिकायत करते हैं शरद नागर] स्व. अमृतलाल नागर के छोटे पुत्र। मुझे याद आते हैं मुद्रा जी। कुछ दिन पहले उन्होंने भी यही शिकायत की थी। लोग अपनी विरासत से कट रहे हैं] निर्लिप्त हो रहे हैं। उनमें पहचान नहीं बची है। ‘उस घर में अब कौन रहता है\* मेरी जिज्ञासा नहीं रुकती। कभी देखी थी एक झलक उस घर की...बाहर से। कई बार गुज़री हूं उसके सामने से। सुना है रूपनारायण पाण्डेय के घर ‘शतदल’ में गोष्ठियां हुआ करती थीं। खेतगली में रहते थे रूपनारायण पाण्डेय-रानी कटरा में। कई बार गई हूं उस घर में] भीतर तक। रूपनारायण पाण्डेय का परिवार रहता है वहां। काफी अच्छी स्थिति में देखा है हमेशा उस घर को। पर नागर जी का घर। वो कैसा है] किस स्थिति में है] यह जानने की इच्छा दबी नहीं रह पाती। पता चलता है] वहां कोई नहीं रहता। उसकी व्यवस्था के बारे में जानना चाहती हूं तो आक्रोश फूट पड़ता है शरद जी का ‘क्यों जानना चाहती हैं आप\ क्या फायदा है इस सब का\] लगता है किसी दुखते ज़ख़्म पर हाथ रख दिया था। सहमे हुए अगले प्रश्न के साथ फिर प्रवाहित होता है आक्रोश-’अमृतलाल नागर का वोट बैंक नहीं है] इसलिए उन्हें याद करने की फुर्सत नहीं है किसी को। सौन्दर्यीकरण हो रहा है शहर का। इसके तहत ऐतिहासिक विभूतियों की प्रतिमाएं लग रही हैं। ऊदा देवी और बिजली पासी के ऐतिहासिक योगदान की याद की जा रही है पर अमृतलाल नागर की ऐतिहासिकता] उनका योगदान नहीं याद आता किसी को। आज बस उन्हीं की चर्चा की जा रही है] जो वोट बैंक को बढ़ा सकें। उनकी याद किसी को नहीं आती] जिनका कोई वोट बैंक नहीं है।’ उपयोगिता से जुड़ गई है ऐतिहासिकता। ‘बाबू जी की मृत्यु के समय जब विधानसभा में शोक प्रस्ताव पास हुआ था उस समय इस आवास को संग्रहालय बनाने का प्रस्ताव रखा गया था और तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने इस प्रस्ताव पर विचार करने का आश्वासन भी दिया था पर वो सब ठंडे बस्ते में चला गया।’ शरद जी बताते हैं।

'अमृतलाल नागर के नाम पर चौक में मुक्ताकाशी रंगशाला बनाने की भी योजना थी। उनके नाम का पत्थर भी लगाया गया था वहां, पर अब वह ज्योतिबा फुले के नाम पर बना हुआ है।’ बताते हैं कुमुद नागर जी] ^और सब बात तो छोड़ दें। आपको बताएं] स्व. मदन नागर ‘म्युनिसिपिल आर्ट गैलरी’ की स्थापना करने वालों में मुख्य थे। उस समय उन्होंने वहां जो पेंटिंग्स इकट्ठा की थीं] वो लखनऊ की चित्रकला का सवश्रेष्ठ नमूना थीं। आज ख़त्म है वो सब। पता नहीं क्या हुआ\ सारी पेंटिंग्स त्रिलोक हाउस के पीछे के कमरे में बंद पड़ी हैं। खुद मदन नागर की सारी पेंटिंग्स का कोई पुरसाहाल नहीं है। सब धीरे-धीरे खात्मे की ओर बढ़ रही हैं। जब कृतियों की रक्षा नहीं की जा सकती तो अवशेषों को कौन पूछेगा\*

न जाने कितनी बार शरद नागर ने विकास नगर की तीन मुख्य सड़कों का नाम अमृतलाल नागर] भगवती चरण वर्मा और यशपाल के नाम पर करने का प्रस्ताव सरकार के पास भेजा है। कुमुद नागर ने भी रिंग रोड का नाम अमृतलाल नागर के नाम पर करने का प्रस्ताव सरकार के पास भेजा है पर कभी भी इस बात पर ध्यान नहीं दिया गया। शिकायत सिर्फ अमृतलाल नागर के लिए नहीं है इनकी। कुमुद नागर जी कहते हैं-’मजाज़] भातखण्डे] कालिका प्रसाद] बिन्दादीन महाराज] यशपाल] भगवती बाबू] डा.श्याम सुंदर दास] रूपनारायण पाण्डे] कालीदास कपूर (सरस्वती के नियमित समीक्षक/लेखक)] दुलारे लाल भार्गव और भी न जाने कितनी ऐसी हस्तियां जो लखनवी कला] संस्कृति] साहित्य की पहचान हैं] उन्हें कौन याद करता है\ उन्हें भूलते जा रहे हैं हम। ये सारे ऐसे नाम हैं] जिन्हें ‘प्रिज़र्व’ किया जाना चाहिए पर किसको आती है सुधि। प्रेमचन्द] निराला की भी यह कर्मभूमि है पर उनकी भी किसी को याद नहीं आती।’ याद आता है मुझे गढ़ाकोला में निराला का घर] चन्द्रशेखर ‘आज़ाद’] भगतसिंह] बिस्मिल] अशफ़ाक उल्ला खां का घर] जिनकी बरबादी की दास्तानें अखबारों की सुर्खियों में कई बार आती हैं। पढ़ीस जी की जन्म शताब्दी निकल जाती है खामोशी से] हवा भी नहीं सरसराती।

दरअसल] जिन संस्थाओं को काम है यह] हिंदी संस्थान] ललित कला अकादमी] ये सब मृत हैं। पूरी धरोहर को संजोकर] सहेजकर रखने के लिए बनायी गई हैं ये संस्थाएं] सिर्फ गोष्ठी] अनुदान या प्रकाशन ही इनका दायित्व नहीं है। पर इन संस्थाओं में तो साहित्य व संस्कृतिकर्मियों के पूरे फोटो भी नहीं मिलेंगे। श्री नारायण चतुर्वेदी की तस्वीर की ज़रूरत जब पड़ी हिंदी संस्थान को तो शरद नागर के पास से मंगाई गई।

^जहां ये भदेसपन हो वहां क्या उम्मीद की जाए\ जनसंकुल क्षेत्रों में किसी सांस्कृतिक केन्द्र की स्थापना होनी चाहिए। स्व. नागर जी के आवास को नागर जी के नाम पर पुराने लखनऊ की सांस्कृतिक-साहित्यिक संपदा का केन्द्र बनाने का प्रस्ताव भी दिया गया था पर कोई सुनवाई नहीं हुई’] शरद नागर की कुंठा बिखर रही है निरंतर।

शरद नागर पैर से लाचार हैं। अब उस घर की देखभाल उनके वश की बात नहीं है।’शायद किराये का घर होने की वजह से सरकार इस प्रकार के प्रस्तावों की ओर कोई ध्यान नहीं दे रही है। हां] मिर्ज़ामण्डी के सामने एक ‘अमृत बाज़ार’ बनाने का प्रस्ताव दिया था नगर विकास मंत्री लाल जी टण्डन ने और उसी में अमृतलाल नागर का आॅडिटोरियम बनाने का भी वायदा किया था पर अब पता नहीं क्या हुआ\ मैं तो दो बरस से इस घर से निकल नहीं पाया हूं’] बताते हैं शरद जी। ‘शिक्षा के साथ संस्कृति का समन्वय ज़रूरी है। विरासत के प्रति जागरूकता लाने के लिए तो प्रयास करने पड़ेंगे।’ बहरहाल] कुल जमा बात यह है कि बदलते हुए समय की गति ने न तो चौक को ‘यूनिवर्सिटी’ रहने दिया है और ना ही वो नागर जी के मकान के अवशेषों को बचा पाएगी। चौक की पहचान के साथ नफ़ासत-नज़ाकत के साथ] मक्खन और चाट के साथ] इमारतों और बागों के साथ] तहज़ीब-ओ-तमीज़ के साथ] रेवड़ियों] मिठाइयों] ठंडाई के साथ] चिकन व ज़रदोज़ी के साथ बिछुड़ रहा है लखनऊ अपनी ‘चौक यूनिवर्सिटी’ के इस प्रखर विद्यार्थी की पहचान से भी। सूने पड़े आंगन में अब मृत होती स्मृतियों की परछाइयां ही रह गई हैं। कभी जो दीवारें ‘चकल्लस’ की बैठकों से गुंजायमान रहती थीं] वो कमरे] जो उस क़लमनवीस के चिंतन से रूबरू होते थे] अब समय की क्रूर परतों में दबने के लिए तैयार खड़े हैं और हम विवश हैं उसे चुपचाप खामोशी से मिटते देखने को।


अनुजा

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