^राज] मुझे भूख लगी है.....।’
लो] चुपके से खा लो।
नहीं] मेरा व्रत है.... करवाचौथ का....
मत
खाओ....।
कुछ
क्षणों के बाद।
राज] चांद नहीं निकला अभी तक.....।
मुझे
ज़ोर की भूख लग रही है।
तो
मैं क्या करूं\ मैंने कहा था व्रत करने के लिए....।
ऐ
सिमरन!
हूं.....
चांद....
कहां.....
वो] निकल आया.....
ये दृश्य है एक हिंदी फिल्म का। विदेश में जन्मी पली-बढ़ी एक हिंदुस्तानी लड़की अपने ब्याह के वक्त पहली बार हिंदुस्तान आती है। भारतीय मूल के अपने विदेशी प्रेमी के लिए करवाचौथ का व्रत करती है] विवाह से पहले। यह एक पंजाबी परिवार है। वैसे अमूमन हिंदू परिवारों में विवाह के बाद करवाचौथ करने की परंपरा है। उत्तर भारत में विवाहित स्त्री के लिए करवाचौथ अनिवार्य व्रत है। मान्यता है कि सुहागिनें इसे अपने पति की दीर्घायु व शुभेच्छा से रखती हैं।
भारतीय व्रत-उपवासों में पर्वों की श्रृंखला का यदि अवलोकन करें] तो पाएंगे कि अधिकाश व्रत-पूजा पर्व स्त्रियों के लिए बनाए गए हैं पुरुषों की शुभेच्छा में। फिर वो पुरुष चाहे पति हो] भाई हो या पुत्र। हां] पिता अभी इससे बचे हुए हैं। करवाचौथ इन व्रत उपवासों की श्रृंखला का प्रमुख पर्व है। अन्य व्रतों को यदि स्त्रियां भूल भी जाएं] तो क्षम्य है] किंतु करवाचौथ की अवहेलना उनके लिए क्षम्य नहीं है] और इस दिशा में सबसे अहम् भूमिका पति गृह की अन्य बड़ी-बूढ़ी महिलाएं (सास] ननद] जिठानी) ही निभाती हैं। सारे दिन के निर्जल व्रत के उपरांत ज़ेवर] गहनों] भारी कपड़ों की लकदक] सिंदूर] आलता] मेंहदी से श्रृंगार कर के महिलाएं संध्या होते ही चांद निकलने की बेसब्री से प्रतीक्षा करने लगती हैं। चांद के निकलते ही] आकाश में चढ़ने से पहले ही पहले उसे अर्घ्य देकर उसकी पूजाकर पति की आरती उतार] पति सहित अन्य बड़े-बुज़ुर्गों के चरण-स्पर्श कर ‘दूधो नहाओ] पूतों फलो’ के आशीर्वाद के मध्य गद्गद् होती महिलाएं अपना व्रत तोड़ती हैं।
यदि परिवार में कोई नवेली बहू है तब तो इस पर्व का आडंबर कुछ और ही बढ़ जाता है। नवेली बहू के पितृगृह से ‘करवा’(टोटीदार लोटेनुमा पात्र) आता है। अब ‘करवा’ अकेला तो आएगा नहीं, उसके साथ वधू के पितृगृह की सामर्थ्य अनुसार केवल वर-वधू या अन्य परिवार परिजन के लिए वस्त्राभूषण] मिठाई] रुपए व अन्य जो कुछ अपेक्षित] इच्छित हो] आएगा। न आने की दशा में बहू को सुनना पड़ सकता है-‘किस कंगले घर से आयी है। विदा करके ही बाप ने छुट्टी पा ली....इत्यादि व ऐसी ही अन्य कटु बातें। इस प्रकार लेन-देन की परंपराजन्य भी हो सकता है यह पर्व ।
स्थितियां
कई हो सकती हैं। आधारशिला की दृढ़ता के प्रत्यय से हटकर वैसे भी अब समाज ऊपरी
दिखावे की संस्कृति की ओर अधिक उन्मुख हो रहा है। ऐसे में व्रत-पर्वों का ‘ग्लैमर’
कुछ और ही बढ़ जाता है। अपेक्षाएं और भी बढ़ जाती हैं, पर तेजी से फैलती आधुनिकता के इस युग में
यह आवश्यक है कि इन व्रत-पर्वों के औचित्य और तार्किकता पर प्रश्न उठाए जाएं।
करवाचौथ से जुड़ी मान्यताएं शायद किसी युग में तार्किक प्रतीत होती हों, पर आज जब हम 21वीं सदी के मुहाने पर कंप्यूटर संस्कृति के साथ खड़े हैं और स्त्री-पुरुष समानता की बातें हो रही हैं, आज जब स्त्री एवरेस्ट से लेकर चांद की ऊंचाइयों को नाप चुकी है। समुद्र से लेकर इंग्लिश चैनल तक की गहराइयों की खाक छान चुकी है तब ये बातें हास्यास्पद प्रतीत होती हैं।
कुछ परंपरावादी इसे अनावश्यक आधुनिक और अपसांस्कृतिक रवैया कह सकते हैं। पंडिताई और प्रबुद्धता का जामा ओढ़े कुछ लोग इसे अज्ञानता और धर्मच्युतता का रूप मान सकते हैं। पर इन सारे प्रश्नों और आशंकाओं के उत्तर इसी सांस्कृतिक विचारधारा में मौजूद हैं। अपनी संस्कृति की आधुनिकता और प्रामाणिकता को स्वीकार करके भी हम उसकी घोषणा करने से हिचक रहे हैं। यह आत्महीनता है कि हम अपना कुछ भी बेहतर न मानकर खुद को इन अतार्किक परंपराओं में उलझाए रहते हैं और इन्हीं परंपराओं के आधार पर खुद को महान साबित करने की कोशिश करते रहते हैं। कभी इनके मूल में नहीं जाते कि अपने ज्ञान को गतिशील आधुनिकता की कसौटी पर कस सकें।
इस प्रकार यदि हम भारतीय समाज की मान्यताओं व परंपराओं को अति रूढ़िवादी और अंधविश्वासी मान भी लें तो किसी व्रत-पर्व का किसी की आयु वृद्धि से किसी प्रकार का कोई संबंध नहीं जुड़ सकता। क्योंकि ज्योतिष गणना की वैज्ञानिकता का जिन लोगों को ठीक-ठीक ज्ञान है वे विद्वज्जन यह भली प्रकार जानते होंगे कि नवजात शिशु के जन्म के घड़ी पल का यदि एकदम सही ज्ञान हो तो उसके आधार पर जातक की संपूर्ण जीवन दशा और मृत्यु का क्षण व प्रकार भी उसी क्षण निश्चित हो जाता है] जब जातक का जन्म होता है। जातक की मृत्यु के विवरण के साथ ही जन्म-कुंडली का अंत होता है। तो इस प्रकार पति की मृत्यु का क्षण जब पत्नी के जन्म से पूर्व (भारतीय समाज में पत्नियां आयु में पतियों से एक दो बरस या दस बरस या इससे भी अधिक छोटी हो सकती हैं] भले ही वे इसके जैवकीय या सामाजिक कारण न जानते हों।) ही निश्चित हो जाता है तो पत्नी की व्रत-पूजा इसमें किसी प्रकार का संशोधन करके विधाता के विधान में दखल कैसे दे सकती है? आखिर पत्नी भी तो विधाता की एक कृति है।
अब अगर यह मान भी लिया जाए कि इसका पति के जीवन से कोई संबंध है तो तलाशें इसकी वजह कि भारतीय समाज में विधुर कम और विधवाएं अधिक क्यों हैं\ आखिर पति तो पत्नी की दीर्घायु के लिए कोई व्रत नहीं रहते। जब भारतीय समाज में पत्नियां करवाचौथ का व्रत हर वर्ष करके पति की दीर्घायु की कामना] प्रार्थना करती हैं तो पुरुष मृत्यु दर अधिक क्यों है\
दरअसल उसके अन्य कारण हैं। इस दौर में औसत आयु 60&70 वर्ष है। अब पति की आयु जब पत्नी से अधिक है तो वह अपनी औसत आयु प्राप्त करके मृत्यु को प्राप्त होगा ही। दूसरी बात पुरुष का कार्यक्षेत्र घर से बाहर है। समाज के पितृसत्तात्मक होने की वजह से सारी आर्थिक] सामाजिक व पारिवारिक ज़िम्मेदारियां पुरुष की हो जाती हैं। ऐसे में अत्यधिक मानसिक दबाव से वह अनेक रोगों का शिकार होता है। इसलिए भी मृत्युदर अधिक है। प्रकृति से सहनशील न होने के कारण वह इन सामाजिक] आर्थिक] पारिवारिक व व्यक्तिगत तनावों से मुक्ति पाने के लिए नशे का सहारा लेता है। ये नशे शराब] भांग] गांजा] अफीम] चरस] सिगरेट से लेकर अन्य आधुनिक नशों तक कुछ भी हो सकते हैं। ये भी वजह बनते हैं उसकी मृत्यु की। इसके अलावा कई बार घर-बाहर निकलते-बैठते वह आकस्मिक दुर्घटनाओं का भी शिकार होता है। अब इसमें स्त्री का योगदान कहां पर आता है जिसे उसने खुद अपने हाथ का खिलौना] अपनी मर्ज़ी की कठपुतली बना रखा है। पर इन कारणों की तह तक अशिक्षा से ग्रस्त धर्मभीरु] रूढ़िवादी] अंधविश्वासी और कुंठित भारतीय पत्नियां नहीं पहुंच सकती हैं। पति को परमेश्वर और पत्नी को दासी के प्रत्यय में बांधकर संस्कारों में इसी परिकल्पना को कूट-कूट कर भरने वाले भारतीय समाज के विधिवेत्ताओं ने सारे बेहतर निर्णय अपने (पुरुष के) पक्ष में रखे हैं। स्त्रियों को परतंत्रता के अटूट बंधन में बांध कर उन पर तरस खाने के लिए छोड़ दिया गया है। तभी तो तुलसी जैसे विद्वान रचयिताओं का यह दुस्साहस होता है कि एक ओर तो वे-
^ढोल] गंवार] शूद्र]
पशु] नारी] सकल ताड़ना के अधिकारी।’ का राग अलापते हैं तो दूसरी ओर- ‘कत विधि
सृजी नारि जग माहीं। पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं।।’ कहकर उस पर तरस खाते हुए अपना
सारा दोष विधाता के माथे मढ़ देते हैं।
इस तरह रूढ़िवादिता से बंधे हुए हर सांस्कृतिक प्रश्न के उत्तर के लिए सभ्यता के विकास की पड़ताल आवश्यक हो जाती है। जिससे यह जाना जा सके कि वे कौन सी परिस्थितियां थीं जिन्होंने स्त्री को घर] धर्म] परंपरा] मर्यादा] परिवार की श्रृंखलाओं को दण्ड की तरह स्वीकार करने पर बाध्य किया। वे कौन सी विवशताएं थीं] जिन्होंने उसे पति व उसके परिवार में संगम की तीसरी धारा तरह अपना अस्तित्व विलीन कर लेने पर विवश किया। वे क्या स्थितियां थीं जिन्होंने उसकी कोई निजी पहचान नहीं रहने दी। वे क्या कारण थे कि उसके पक्ष में सदैव त्याग] बलिदान ही आया और दया] क्षमा] स्नेह] प्रेम] उदारता] ममता व सहनशीलता जैसे नैसर्गिक गुण उसके ही लिए अभिशाप बन गए। वो ‘व्यक्ति’ से ‘वस्तु’ में बदलती गई।
यह तो सच है कि सृजन की शिथिलता और शारीरिक संरचना की विवशताओं के चलते घर नामक वस्तु का निर्माण हुआ और स्त्री का यायावरी जीवन उसके हाथ से सरक गया। पर यह उसकी स्वतंत्रता पर बंधन नहीं था। वह पुरुष की सामंतवादी मानसिकता का शिकार नहीं थी। सभ्यता के विकास के साथ भिन्न-भिन्न संस्कृतियों का निर्माण शुरू हुआ। हर संस्कृति की पहचान के लिए कुछ परंपराएं बनी। क्षेत्र विशेष के वातावरण व प्राकृतिक संसाधनों के अनुरूप भोजन] वस्त्र के प्रकार ने भी भिन्नता का दर्शन निर्मित किया।
पर व्रत-पर्वों का सिलसिला इस संस्कृति में कब और कैसे शुरू हुआ] कुछ ठीक-ठीक कहा नहीं जा सकता। ना ही यह कहा जा सकता है ठीक-ठीक] कि यह कब औरतों के पक्ष में आ गया\ इसे पूर्णतः पुरुष बुद्धि की उपज भी नहीं माना जा सकता। संभव है गृहकार्यों की एकरसता से ऊबी स्त्रियों की बुद्धि ने ही इन्हें एक मनोरंजक कार्यक्रम के रूप में आरंभ किया हो पुरुष की सामंती प्रवृत्ति और उसके अहं को संतुष्ट करने के लिए] उसके अस्तित्व को बचाए रखने के कारण भी इसमें जोड़ दिए गए होंगे। किंतु बौद्धिक कौशल से उत्पन्न महिलाओं के मनोरंजन का यह कार्यक्रम कालांतर में संस्कृति का अनिवार्य अंग मान लिया गया। इस प्रकार पुरुष के अस्तित्व के स्थायित्व से जुड़ गया नारी के अस्तित्व के स्थायित्व का प्रश्न और उससे शुरु हुई उसे बनाए रखने की कामना की मृगतृष्णा।
किंतु यह तो तय है कि इस प्रकार के तर्कहीन व्रत-पर्व प्राचीन संस्कृति की देन नहीं हैं। क्योंकि भारतीय साहित्य के आधारभूत ग्रंथों ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ में इस प्रकार के किसी व्रत-पर्व का उल्लेख नहीं मिलता। हालांकि इस बात से पूर्णतः इन्कार भी नहीं किया जा सकता कि यह पुरुष की सामंतवादी मानसिकता की भी देन हो सकता है और शायद यह सच भी हो। वैसे] भारतीय समाज शक्ति पूजक होने के नाते स्वयं को मातृसत्तात्मक कहने का ढोंग भले ही रच ले] पर इसी समाज में न्याय प्रिय राम के युग में जहां बलात्कार और अपहरण जैसी घटनाएं घटी हैं वहीं स्त्रियां अग्निपरीक्षा और गृह निष्कासन जैसे शोषण का शिकार भी हुई हैं। इसी समाज में स्त्री को सार्वजनिक रूप से नग्न करने की घटनाएं भी घटी हैं। वो भी उस युग में जब संतानें मां के नाम से जानी जाती थीं। पिता का परिचय इतना महत्वपूर्ण नहीं था अर्थात समाज मातृसत्तात्मक माना जाता था। इसलिए ‘करवाचौथ* जैसे व्रत-उपवास इन्हीं शोषणों की या पुरुष के प्रभुत्व को स्थायी रखने के साधनों की एक कड़ी हो सकते हैं।
वैसे ‘करवाचौथ’ की सामाजिकता पर भी विचार करना ज़रूरी है। समाज के बदलते स्वरूप पर भी विचार करना ज़रूरी है। समाज के बदलते स्वरूप के साथ हमारी सामाजिक परंपराएं भी बदलती रहती हैं। आज हम जहां खड़े हैं] वहां बहुत कुछ पुराना छोड़ चुके हैं। नया ग्रहण कर चुके हैं] ग्रहण कर रहे हैं। इसलिए यह भी संभव है कि किन्हीं सामाजिक] सांस्कृतिक परिस्थितियों से उपजा यह ‘करवाचौथ’ स्त्री से उसके अस्तित्व की पहचान के रूप में जुड़ गया हो। इस संदर्भ में श्रीमती किरण मिश्र का कहना है कि जैन] बौद्ध धर्मों के जन्मकाल में उन्हें हिंदू धर्म पर मंडराता हुआ ख़तरा मानकर उपनिषदों] पुराणों से छोटी-छोटी कहानियां निकाल कर इन व्रत-पर्वों का प्रचलन किया गया होगा। सामाजिक परिवर्तन की दृष्टि से यह तथ्य काफी हद तक सही हो सकता है।
भारतीय परिवार में स्त्री परिवार की धुरी मानी जाती है। स्त्रियां भावनात्मक स्तर पर ज़्यादा संवेदनशील भी होती हैं। उनके इसी गुण का उपयोग समय-समय पर समाज निर्माताओं ने किया। उसकी भावनाओं का दोहन करके जहां समाज को टूटने से बचाने का प्रयास किया गया] वहीं पति] पुत्र] भाई] पिता परिवार के नाम पर उसे मर्यादाओं] श्रृंखलाओं में जकड़कर उसके बौद्धिक विकास को कुंठित किया गया।
इन व्रत-पर्वों के मूल में समाज का आर्थिक पक्ष भी है जो सबसे महत्वपूर्ण है। पितृसत्तात्मक भारतीय समाज में स्त्रियां आर्थिक रूप से पति पर निर्भर रही हैं। अपने खाने] कपड़े व अन्य आवश्यक दूसरी वस्तुओं के लिए भी उन्हें पति का मुहं जोहना पड़ता है। इसलिए भी पति के जीवन से उसके अस्तित्व का प्रश्न जुड़ जाता है। इसलिए अपरोक्ष रूप से अपने अस्तित्व की चिंता में वह पति के अस्तित्व की चिंता करती है।
यही मूल उत्स है उस भावना का जो उन्हें सधवा मृत्यु की कामना से बांधती है और विधवा को हेय दृष्टि से देखने की प्रेरणा देती है। यह ‘अर्थ’ ही है जो उन्हें पति के चारों ओर चकरघिन्नी सा घुमाता है] और पति को क्यों] पुरुष के समस्त रूपों के चारों ओर।
हर रूप में वह हाथ फैलाए है] याचक है। दाता की भूमिका में तो पुरुष ही है। इसलिए ही वह अपने पुरुष का सुरक्षात्मक घेरा मज़बूत करने का असफल प्रयास करती रही है। शिक्षा और बौद्धिक विकास से संपर्क न होने के कारण नियतिवादी होते हुए भी यथार्थ से अपरिचित भारतीय स्त्री ‘करवाचौथ’ सरीखी छलनाओं से स्वयं को बहलाती रही है।
पर आज के युग में जब स्त्रियां शिक्षित हैं] आत्मनिर्भर हैं तब भी इन व्रत-पर्वों की तार्किकता पर बिना कोई विचार किए बस उन्हें निभाए चली जा रही है] यह कहकर कि ‘यह हमारी संस्कृति है।’ आश्चर्य तो तब होता है जब वे यह मानती हैं कि ये निराधार हैं लेकिन इनके क्षणिक आकर्षण से बंधकर इन्हें छोड़ने को तैयार नहीं होतीं और इनकी महानता के गुण गाती हैं।
इस संदर्भ में स्त्री-पुरुषों के मध्य किए गए एक सर्वेक्षण से ज्ञात हुआ कि अधिकांश पुरुष यह जानते ही नहीं कि उनकी पत्नियां यह व्रत क्यों करती हैं\ जो जानते हैं] वे इसे मूर्खता के अतिरिक्त कुछ नहीं बताते। शेष में से कुछ तटस्थ हैं तो कुछ इसके आग्रही। इसके विरोधियों की संख्या न्यूनतम है। स्त्रियों में से अधिकांशतः ऐसी मिलीं जो यह जानती हैं कि यह बिल्कुल तर्कहीन और बेकार है] पर परिवार की बुजुर्ग स्त्रियों के दबाम में रहती हैं। सबसे ज़्यादा मज़े की बात यह है कि ये बुजु़र्ग स्त्रियां भी यह जानती और मानती हैं कि इसका पति की आयु से कोई संबंध नहीं। फिर भी वे इसे करती हैं] करवाती हैं।
इस सदी की विडम्बना ही है कि हम अभी तक संस्कृति के नाम पर बहुत कुछ ऐसा ओढ़े हुए हैं जो संस्कृति नहीं] समय की देन है और हम इसे छोड़ते हुए शायद इसलिए डर रहे हैं कि कहीं अति आधुनिकतावादी न करार दिए जाएं।
इस
बात का यह तात्पर्य कदापि नहीं कि स्त्री को सांस्कृतिक मान्यताओं से विलग करने का
आग्रह किया जा रहा है। किंतु स्त्री अस्तित्व की सार्थकता और स्थायित्व के साथ हम
जिन प्रत्ययों को जोड़े हुए हैं उनका तार्किक व बौद्धिक आधार क्या है] यह प्रश्न भी कुछ कम विचारणीय नहीं है।
इसलिए संस्कृति के नाम पर ढोए जाने वाले इन पर्वों को निरंतर अपनी स्वीकृति देते
हुए अपने अस्तित्व की खोखली पहचान से अपने को जोड़े रखना अपने स्थायित्व का भ्रम ही
है] अन्य कुछ नहीं। भारतीय
समाज में करवाचौथ ही नहीं]
तीज] वट-सावित्री और ऐसे ही अनेक अन्य पर्व
मौजूद हैं] जो स्त्री को उसकी
पारंपरिकता से मुक्त कर संपूर्ण विकास की ओर अग्रसर नहीं होने दे रहे हैं।
जब तक स्त्री बूढे़ चंद्रमा और बूढ़े पति की प्राप्ति के प्रत्ययों में फंसी रहेगी] उसके उपग्रह होने के भौगोलिक तथ्य को स्वीकार कर अर्घ्यदान नहीं छोड़ेगी] तब तक उसकी मुक्ति संभव नहीं है। चाहे आप संसद में सौ फीसदी आरक्षण करा लें या नारी मुक्ति संगठन सड़कों पर अनवरत आंदोलन करें। पर ‘करवाचौथी’ संस्कृति से मुक्त हुए बिना स्त्री की कोई पहचान नहीं हो सकती है।
अनुजा
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें