निशान रह जाते हैं....
आहटें रह जाती हैं....अंदेशे रह जाते हैं....
उम्मीदें रह जाती हैं...
अपनी तमाम निराशाओं के साथ....
समय और लोग तो गुज़र ही जाते हैं....
अपनी रफ्तार के साथ.......।
अनुजा
गुलज़ार से पहली मुलाकात हुई थी लखनउ के होटल ताज में, जगजीत सिंह भी साथ में थे। सोच के गयी थी कि उन दोनों का इंटरव्यू करेंगे। प्रतिभा और मैं दोनों साथ थे। उसी दिन मुझे पता चला था कि गुलज़ार प्रतिभा के हीरो हैं। नवीन जी ने बताया था। हम उन दिनों स्वतंत्र भारत में थे। ये 1996-97 का दौर था। पर कभी कभी ऐसा भी होता है कि हम नि:शब्द हो जाते हैं जब उनसे मिलते हैं जो हमारी सोच का एक हिस्सा हो जाते हैं। ऐसे ही लोग नायक हो जाते हैं। उस वक्त पत्रकार, लेखक और व्यक्ति को अलग करना मुश्किल होता है। वो वक्त वही वक्त था जब हम उनसे एक भी शब्द नहीं पूछ सके, बस खामोशी को बहते बोलते सुनते रहे तमाम सवालों के शोर में....।
खोल दी हैं मुट्ठियां....