शनिवार, 7 मार्च 2026

आँधी कब बनोगी...




सुनो,
वो तुम ही थीं न...
जिसने पहली बात बाँधा था स्वच्छंद प्रकृति को....
 
तुम ही थीं वो
जो रुकीं थीं पहली बार अपने शिशु के साथ...
किसी दीवार सी जगह में....
 
तुम ही थीं न वो....
जिसने पहली बार
आसमान के तले बिछी
विस्तृत धरती को बाँधा था
कुछ टुकड़े जोड़कर बनाया था घर
 
तुम्हीं थीं न वो
जिसने पहली बार
चीरा था धरती का गर्भ
किसी नुकीले हल सरीखे तीखेपन से....
 
तुम ही थीं ना
जिसने सिरजी थी कोई खेतीनुमा चीज़
 
तुमने ही बाँधा था अपने भागते दौड़ते विचरते कदमों को
जंगल को बनाया था बगिया
बगिया के पास कोई घर...
 
और फिर क्या हुआ भैरवी
कि छोड़ दिया तुमने सब...
कर लिए पीछे पाँव...
 
तुम ही थीं गुरू...
इस सिरजन की...
फिर क्या हुआ बंदिनी...
 
कुछ याद है तुम्हें
कहाँ छूटा वह सहचर...
जिसके क़दमों से मिलकर
तुमने तय की सदियों की यात्राएँ...
कहाँ खोया वह घर...
कहाँ गयी वह बगिया...
 
आज हवा के किसी झोंके सी
इस घर से उस घर
इस धरती से उस धरती तक
बस डोलती हो बावली सी...
सब कुछ खोकर....
आँधी कब बनोगी....???

अनुजा

08.03.2017




कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें