शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

भयशून्य चित्त चपल.....

ये सर्द मौसम और पतझड़ के दिन हैं...बेहद उदास, अकेले और निराशा से भरे हुए...उम्मीद तो कोई नहीं पर लगता ज़रूर है कि कहीं कुछ है...मन, बुद्धि, आशंका और अवसाद से भरे हैं। भय भीतर उमगता है तो उसे दवा  शांत कर देती है...चित्त कुछ कहता नहीं मौन रहता है और कभी कभी शांत भी...विचारों की गहरी हिलोर उठती है लेकिन उसमें केवल चिंताएं और फिक्र हैं...परिजन और परिवार की....अपना क्या है, कब तक है कुछ आभास नहीं होता।

....जी चाहता है कि लिखूं कुछ पर शब्द मौन हैं...कभी कभी लगता है कि क्या जो सीखा समझा आज तक, वह सब उलट गया है क्या? बेहद उथल पुथल के दिन हैं बाहर....पर भीतर सब शान्त, निरपेक्ष और निस्पन्द है...क्या क्यों हो रहा है और इसका परिणाम क्या होगा...इसका कोई प्रश्न उत्तर भीतर नहीं उठता...कोई भी कुछ कह रहा है तो ठीक है...नहीं कह रहा है तो और भी बेहतर है....। इस शान्त सरोवर में कभी कभी कोई छोटी सी कंकड़ी आ गिरती है पर उसे भी मौन के वैराग्य में दबाने की कोशिश रहती है...समझ नहीं आता कि कौन बदल गया है....हम या समय....

बहुत कुछ कहना था...बहुत कुछ बाक़ी है कहने को....पर अब जी नहीं चाहता...सांसों के सुमिरन पर माला जपूं....बस इतना ही रहता है.....चित्त भयशून्य है पर मस्तिष्क हौंकता है...भय से भरपूर है...असुरक्षा और असहजता से....धूप भी मैली सी है...धुंधली सी और एक बर्फीली सर्द हवा के घेरे में है सब कुछ... ऊष्मा भीतर की हो या बाहर की....सब सूख चुकी है.....मन न आहत होता है और न आनन्दित.....

वो न आए तो सताती है खलिश सी दिल को, वो जो आए तो ख़लिश और जवां होती है...वाली कै़फियत अब नहीं है....पता नहीं कि ‘अब नहीं है या आजकल नहीं है’ ? यह सर्द हवाओं  का असर है या एक सर्द मौसम भीतर एक ग्लेशियर बना रहा है?

सब कुछ अनिश्चित है....लगता है सब अन्त की ओर है....।

यह सचमुच कुछ कहना है या एक बेचैन बड़बड़ाहट है....शान्ति के भीतर हौंकती एक बेचैनी, चित्त नहीं समझ पाता।

अनुजा

 29.12.2019


बुधवार, 14 जनवरी 2026

बैठे-ठाले

कल अगर मैं नहीं हूँ तो किसी को क्या फ़र्क पड़ेगा... 
दो दिन भी नहीं.... फिर चल पड़ेंगे सब अपनी राह... 
अपना घर... अपने बच्चे... 

कभी ज़िक्र आया भी तो यूँ...  'अरे,  बड़ी ज़िद्दी थीं.... मनमानी की और मर गईं... कभी बात नहीं मानती थीं... देखा क्या हाल हुआ...

शादी ज़रूर करनी चाहिए...अकेले कोई ज़िन्दगी नहीं काट सकता.... फलां को देखा था... क्या हाल हुआ था... जो किताबों में लिखा है.. गलत थोड़े है... जो नियम बनाए गए हैं... इसीलिए.. वगैरा वगैरा... '

लड़की अविवाहित हो,  तलाकशुदा हो या पतिविहीन हो... इनमें से किसी भी सि्थति में वह मुख्यधारा से अलग हो जाती है....'सुनिए,  घर वापस  लौटी लड़की की इज्ज़त नहीं होती...' मेरी एक मित्र ने कहा एक दिन...कोई लड़की का स्वामी दिवंगत हो गया... अपने बच्चे के साथ रहकर लौटी... साथ कोई नहीं  था... सब ख़ुद ही करना था... किया.. नौकरी की.. बच्चे को बड़ा किया... संयोग से ऐसे अनेक लोग मिले मुझे जीवन में...जो इस तरह के संघर्षों में ज़िंदगी को समझने की कोशिश कर रहे थे... और प्रतिक्रिया और परिणाम  एक जैसे ही दिखाई पड़ रहे थे....!

और सबके बारे में एक ही जैसी बात हो रही थी.. गॉसिप में... थोड़ी बहुत फेर बदल के साथ.. 

देखो, उसने छोड़ दिया...क्या मिला... क्या इज़्ज़त रही... घर में कौन पूछता है... 

अपने आप को सँभालना चाहिए... कौन कब तक करेगा...., जिसके पति दिवंगत हो गए.... 

फलाँ का चाल चलन नहीं अच्छा... पीकर लौटती है... 

पता है, ये कौन लोग हैं... जो किसी मुश्किल में इन औरतों के साथ नहीं खड़े हुए.. 

कुछ बोझ मानते हुए थोड़ी बहुत मदद कर गए.. 

मगर किसी ने सहर्ष नहीं स्वीकारा...

किसी ने उन औरतों की हिम्मत और संघर्ष पर बात नहीं की.. 

पता है... इस सारी गॉसिप से एक भय का संचार किया जाता है  मनों में... कभी भी वास्तविक प्रश्नों  पर बात नहीं  होगी..... 

वास्तव में वो ख़तरनाक प्रश्न  हैं... उन पर बात करना आसान नहीं है...

और इस तरह  निर्णय लेने का हक़ बच्चों... खासकर लड़कियों से छीन लिया जाएगा.... अभी भी कहाँ दिया जाता है.. ? कभी  जीवन के लिए तैयार नहीं किया जाता....! 

अब तस्वीर उलट दीजिए....इन औरत की जगह आदम को रख दीजिए... फिर गॉसिप देखिए-

अरे उसने शादी नहीं की... भाई/ बहन को बच्चों के लिए करता... अरे बीवी नहीं है... शादी कर लेते या हो जाती तो बेहतर होता.....बीवी के बाद बच्चों को खुद पाल रहे हैं... माँ साथ रहती हैं.....

याँ कोई मनमानी की बात नहीं करता... सेक्रिफाइज़ का बात होती है....  ये फर्क है... 

मनमानी हो या मजबूरी... जीवन में सबको एक चश्मे से नहीं देखा जाता....  मगर मनमानी कर जीवन की राह अपनी चुनने वालों को खासा कोसा जाता है.. खासकर लड़कियों को.. 

ऐसे... जैसे जिन्होंने मनमानी नहीं की... वो परेशान नहीं हुए..सदा अमर रहे.... 

(ऐसे ही... चलते-चलते...)


अनुजा


सोमवार, 17 फ़रवरी 2025

कई बार बच्चों को समझाते हुए ऐसा लगा, ऐसा महसूस हुआ कि अमुक बात मेरे ही भीतर प्रतिध्वनित हो रही है...मेरे ही अपने किन्हीं कठिन क्षणों का सांत्वना पत्र है...जैसे कि यह बात मैं बच्चों से नहीं खु़द से कहना चाहती हूं कि जीवन कभी एक सीधी राह या सरल रेखा भर नहीं है....वह ज़िगज़ैग चलता है, आड़े तिरछे रास्तों पर चलता है और कई बार दौड़ता भी है....उससे हताश नहीं होना है....उसको महसूस करना है....जीना है....सीखना है...और यात्रा पर आगे बढ़ जाना है....! 

कितनी बार...कितनी बार ऐसा होता है कि जो बात समझने के लिए आप किसी अन्य प्रबुद्ध व्यक्ति की शरण में जाते हैं....वही आप खुद कह रहे होते हैं....उस क्षण लगता है कि यह बात आप दूसरों से नहीं, अपने आप से कह रहे हैं....खु़द को समझा रहे हैं....! आह ! जीवन कितनी बार, कितनी तरह से आपको समझाता है...मगर कई बार धैर्य का सिरा आपके हाथ से खींच लेता है....तब आपको भी किसी कृष्ण की ज़रूरत पड़ती है....! शायद सबमें एक कृष्ण है....अलग-अलग अवसरों पर वह भीतर और बाहर प्रकट होता है....!

11.01.2025

अनुजा


व्यष्टि से समष्टि....

पता नहीं ऐसा क्यों है कि अधिकांश लोग निजी, सामाजिक, रचनात्मक इत्यादि के फर्क में उलझे रहते हैं। या तो वे जानते नहीं या जानते हैं, मानते नहीं, अथवा जानकारी केवल दूसरों के लिए होती है। रचना कोई भी हो, उसका आधार बिन्दु कोई व्यक्तिगत अनुभव ही होता है। अपने साथ घटी कोई बात, या किसी और के साथ घटी कोई बात, जिसके साक्षी हम भी होते हैं, उस क्षण में, और वो हमारे अनुभव में शामिल हो जाता है। उस पर हमारी संवेदनाएं, प्रतिक्रियाएँ, या विचार उसे हमारा निजी बना देता है...और इसी निज से शुरू होती है कोई समष्टि की यात्रा, कोई कहानी। पर यह मेरा अद्भुत अनुभव है कि लोग अपनी रचना में से अपने इस निज को किसी और को दिखाना नहीं चाहते। इसे कोई विशिष्ट और नितांत अपना बना कर किसी कोने में छिपा देना चाहते हैं। जबकि ठीक उसी क्षण दुनिया के दूसरे कई कोनों में कोई वैसा ही अनुभव दूसरे कई लोगों के साथ घट रहा होता है। फिर कोई भी अनुभव निजी, या अनोखा कैसे हुआ? 

अनुजा

05.04,2024

गुरुवार, 19 अक्टूबर 2023

छेड़कर वीणा ये किसने.....

छेड़कर वीणा ये किसने 
मृत्यु का है गीत गाया ?
सप्त-सुर के बीच किसने
आठवाँ सुर यह लगाया

फूल का दामन झटककर 
ज़िन्दगी कल पास आयी
लाख चाहा, मन न भीगे
आँख लेकिन डबडबायी 

और छलिया एक भँवरा, 
पी गया सारा मधुर रस
दो दिनों की एक दुनिया
दो पलों में ही गँवायी ।

मुस्कुराहट के चमन के 
कौन ये पतझार लाया ?

आग सी यूँ लग गयी है
जल रहा धू-धू गगन तक
नफ़रतों की आँधियों में 
उड़ गया सबका सपन तक 

एक बगिया थी कि जिसमें 
फूल हर रंग के लगे थे
पर घृणा के यज्ञ में इस 
हो गया जीवन हवन तक

सृजन की इस मधुर बेला 
में है क्यूँ संहार आया ?

इन घृणा की आँधियों का 
कौन   ज़िम्मेदार   होगा
प्रश्न है इतना मगर क्या 
शीघ्र ही हल हो सकेगा ?

व्यर्थ का संहार करके 
फूल का हर घर जला के
क्या बचे श्मशान में फिर 
राज्य कोई कर सकेगा ? 

दिग्दिगन्तों से उठे इस 
प्रश्न ने उत्तर मँगाया ।

मौन, लेकिन मौन केवल 
सब निरुत्तर आज हर पल
कुर्सियों की नीति में इस 
आज खोया घर का सम्बल

कौन दे उत्तर कि जब 
उत्तर छुपा सबने दिया है
जागने वाले को   क्या 
कोई जगायेगा  भला  कल 

कान सबने बंद करके 
शोर है दुगना मचाया ।।

प्रश्न का उत्तर नहीं इस 
और कल पूछेगा कोई 
क्यों भगतसिंह की ज़मीं 
इस सरज़मीं से कहाँ खोयी 

किसलिए फिर एकता के 
प्रश्न से है मुहँ चुराया ?

बन्द कर दो, बन्द कर दो
आज ये संहार सारा 
जो बना सकते नहीं तुम 
क्यों उसे तुमने मिटाया ?

मिल गया सारा सहज क्या
इसलिए आक्रोश है यह 
क्यों नहीं बलिदान का वह 
अमर गायन तुम्हें आया ?

यदि तुम्हें आ जाए वह तो 
पओगे जीवन मधुर रस 
जो नहीं संहार के मन्थन 
में तुमने कभी पाया । 
27.11.1988
अनुजा