
....जी चाहता है कि लिखूं कुछ पर शब्द मौन हैं...कभी कभी लगता है कि क्या जो सीखा समझा आज तक, वह सब उलट गया है क्या? बेहद उथल पुथल के दिन हैं बाहर....पर भीतर सब शान्त, निरपेक्ष और निस्पन्द है...क्या क्यों हो रहा है और इसका परिणाम क्या होगा...इसका कोई प्रश्न उत्तर भीतर नहीं उठता...कोई भी कुछ कह रहा है तो ठीक है...नहीं कह रहा है तो और भी बेहतर है....। इस शान्त सरोवर में कभी कभी कोई छोटी सी कंकड़ी आ गिरती है पर उसे भी मौन के वैराग्य में दबाने की कोशिश रहती है...समझ नहीं आता कि कौन बदल गया है....हम या समय....
बहुत कुछ कहना था...बहुत कुछ बाक़ी है कहने को....पर अब जी नहीं चाहता...सांसों के सुमिरन पर माला जपूं....बस इतना ही रहता है.....चित्त भयशून्य है पर मस्तिष्क हौंकता है...भय से भरपूर है...असुरक्षा और असहजता से....धूप भी मैली सी है...धुंधली सी और एक बर्फीली सर्द हवा के घेरे में है सब कुछ... ऊष्मा भीतर की हो या बाहर की....सब सूख चुकी है.....मन न आहत होता है और न आनन्दित.....
वो न आए तो सताती है खलिश सी दिल को, वो जो आए तो ख़लिश और जवां होती है...वाली कै़फियत अब नहीं है....पता नहीं कि ‘अब नहीं है या आजकल नहीं है’ ? यह सर्द हवाओं का असर है या एक सर्द मौसम भीतर एक ग्लेशियर बना रहा है?
सब कुछ अनिश्चित है....लगता है सब अन्त की ओर है....।
यह सचमुच कुछ कहना है या एक बेचैन बड़बड़ाहट है....शान्ति के भीतर हौंकती एक बेचैनी, चित्त नहीं समझ पाता।
अनुजा
29.12.2019